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मोह और प्रेम

लिखने को कुछ नहीं था, परंतु शब्द मस्तिष्क में ऐसे कुलबुला रहे थे मानो बाहर आने को व्याकुल हों।
मन के दो छोर सामने थे—एक ओर मोह, जो मुट्ठी में क़ैद था, और दूसरी ओर प्रेम, जो आज़ाद पंछी की तरह उड़ना चाहता था। यह विडंबना ही थी कि प्रेम ने ही मोह को जन्म दिया, फिर भी उसी की कैद प्रेम को असह्य हो गई।मोह के भीतर संदेह के जीवाणु पलते रहे, जिन्हें प्रेम ने कभी स्वीकार नहीं किया।प्रेम बसंत की शुरुआत था—नवजीवन का उत्सव, जबकि मोह पतझड़ का सूना संदेश।
प्रेम उमड़ते समंदर की लहर था, मोह रेत का वह कण, जो मुट्ठी में थमता ही नहीं और फिसल जाने को आतुर रहता है।

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