
खुशी झा, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
कुछ औरत निभा लेती है हर रस्म,
हर बंधन, हर तीज-त्यौहार…
मगर निभा-पाया नहीं पाती है
खुद को खुश रखने का
अपने आप से कोई वादा…
सुबह की भगदड़…
बच्चों को तैयार करना…
टिफ़िन बनाना…
स्कूल को छोड़ना…
घर के काम निपटाना…
इस सब में भूल जाती है
अपने आपको सीसे में निहारना…
पति, सास, ससुर…
उठती एक औरत हर जिम्मेदारियाँ…
हर काम, हर ओर होती है
उसकी नजर बड़ी बारिकियों…
मगर भूल जाती है वो
शीशे में खुद को निहारना…
बिंदी, पायल, झुमके…
तो छोड़ो, ख़्याल नहीं करती
खुद के पल्लू भी संवारना…
एक वक्त, एक हालात से
जब कोई होती है उसे
बीमारियाँ… तो फिर भी
सुनने पड़ते हैं ताने
और न जाने कितनी हीं यातनाएँ…
क्या कभी सोचा है किसी ने…
उस औरत ने सही नहीं होती
ऐसी ज़िंदगियाँ क्यों क्योंकि
खुद के प्रति भी होती है
एक सबसे महत्वपूर्ण…
जिम्मेदारियाँ…

सही लिखा आपने
सभी पाठकों का आभार-अभिनंदन, आप
इसी तरह उत्साहवर्धन करते रहें
-सुरेश परिहार, एडिटर, लाइव वॉयर न्यूज
बिल्कुल सही