
डॉ. नेत्रा रावणकर, प्रसिद्ध लेखिका, उज्जैन
अब जिंदगी गुनगुनाने लगी है
हौले -हौले मंद बयार सी….
मीठे -मीठे सपनों के झुरमूट में
रात लेती है करवट अलसाई सी..
बुनता रहता है अजीबोगरीब खयाल हरदम
और आस भी रखता है एक उजली चांदनी सी……
बातों – मुलाकातों का
सिलसिला जारी है हरदम
फिर भी दिल में
क्यों रहती है ख़लिश सी…..
चारों ओर दावानल था
ज़ख्म भी थे हरे – भरे
ऐसे में बात करता था
वो मोगरे सी……
नहीं सोचा आगे नतीजा क्या होगा
मगर बात लगती है उसकी
पत्थर की लकीर सी …..