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माँ शैलपुत्री

सुनीता मलिक सोलंकी, मुजफ्फरनगर (उप्र) प्रथम शैलपुत्री देवी,आज नवरात्र में कृपा बरसाए माँ।भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।। पहला दिन शैलपुत्री स्वरूप,पर्वतराज हिमालय की पुत्री तू।पूर्व जन्म में राजा दक्ष की थी पुत्री,तब माँ का नाम पड़ गया था सती।। तेरी महिमा सारी कह न सके माँ,भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।। सती…

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ज़िंदगी गुनगुनाने लगी

अब ज़िंदगी मानो गुनगुनाने लगी है। हवा की धीमी-धीमी बयार की तरह इसमें मिठास घुलने लगी है। मीठे सपनों की छाँव में रात भी अलसाई-सी करवट लेती है। मन अजीबोगरीब खयाल बुनता रहता है और उजली चांदनी-सी उम्मीद सँजोए रहता है।

बातों और मुलाक़ातों का सिलसिला लगातार चलता है, फिर भी दिल के भीतर कहीं एक हल्की-सी खलिश बनी रहती है। बीते दिनों में चारों ओर दावानल था, घाव भी हरे-भरे थे। ऐसे कठिन समय में उसकी बातें मोगरे की महक जैसी सुकून देती थीं।

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हिसाब–किताब में कच्ची हूँ

मैं हिसाब–किताब में कच्ची हूँ, लेकिन दिल से अब भी बच्ची ही हूँ। जोड़-घटाना ज़्यादा नहीं आता और भाग भी कुछ कम ही आता है। किसको क्या दिया था, यह भी याद नहीं रहता क्योंकि दिमाग़ ज़्यादा लगाना मेरी आदत नहीं। मुझे बस थोड़े से सुकून की तलाश रहती है और उसके लिए मैं किसी के पीछे भागती नहीं। मेरी कोशिश यही रहती है कि खुशी के छोटे-छोटे पल कहीं छूट न जाएँ, इसलिए उन्हें अपनी मुट्ठी में कैद कर लेती हूँ। दुख के बीते पल मैं रेत की भाँति बहा देती हूँ। इस तरह, मुट्ठी में समाए हुए पल मेरे अपने हो जाते हैं और दुख के सारे पल पीछे ही छूट जाते हैं।

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