क्यों है?

डॉ. नेत्रा रावणकर, प्रसिद्ध लेखिका, उज्जैन

राह में बिखरा पड़ा है काँटों का मंजर
आस फूलों की दिल को लगाता क्यों है

बेवफाई के किस्सों से भरा पड़ा है दामन सारा
वफ़ाओं पर फिर भी भरोसा क्यों है

हैरान है उसकी पल-पल रूठने की आदत से
फिर भी नाज़-नखरे उठाता क्यों है

आँधी, तूफ़ाँ उसे रोक नहीं पाएंगे
इस बात पर दिल नाज़ करता क्यों है

हरी-भरी वादियों पर उसने डाला लाल रंग
हद हो गई फिर भी उसको बख़्शता क्यों है

समुन्दर की गहराई नापने का हुनर है उसमें
गोता लगाने से फिर डरता क्यों है

रोज़-रोज़ बदल रहा है चेहरा उसका
आइना उसे देखकर हैरान सा क्यों है

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