वो दिन आज भी स्मृति में ताजे हैं, जब बिहार के छपरा शहर में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे थे. चारों ओर डर का माहौल था, एक अनजानी आशंका हर घर के आंगन में सन्नाटा बनकर पसरी हुई थी. उन्हीं कठिन दिनों में, हमारे घर में एक गरीब मुस्लिम लड़का भी रहता था, जो गांव से पढ़ाई के लिए भेजा गया था.
उसे पापा के किसी पुराने मित्र ने यह कहकर भेजा था कि बेटा पढ़ाई में बहुत तेज़ है, लेकिन हालात ठीक नहीं हैं्. आपने बहुतों की मदद की है, आज इसे भी आपके सहारे की ज़रूरत है. पापा ने बिना किसी भेदभाव के उसे अपने घर में आश्रय दिया. जब शहर में दंगे भड़के, तो उसे सुरक्षित उसके घर पहुंचाने की जिम्मेदारी भी उन्होंने उठाई्. हालात सामान्य होने पर वे फिर उसे वापस ले आए्.
इसी तरह, एक गरीब ब्राह्मण युवक भी पापा के संरक्षण में था. उसे पापा ने नौकरी लगवाने का आश्वासन देकर अपने घर में रखा था. दोनों ही युवक घर के बच्चों को पढ़ाया करते थे और ट्यूशन भी पढ़ाते थे. उनका रहना, खाना, आना-जाना सब कुछ पूरी आज़ादी के साथ हमारे घर में होता था.
उन्हीं दिनों हमारे घर में कई नौकर काम किया करते थे. एक दिन अचानक एक नौकर लापता हो गया. काफी तलाश करने पर भी कुछ पता नहीं चला. तब उसके घर खबर भिजवाई गई. उसके पिता ने बताया कि तिवारी जी (वही ब्राह्मण युवक) ने लालच देकर उस नौकर को शहर के एक बड़े व्यक्ति पंकज सिनेमा के मालिक के यहां नौकरी पर लगवा दिया था. दो महीने से वहां उसे न तनख्वाह मिल रही थी, न ही इंसानियत का बर्ताव.
पापा ने तुरंत एक शिक्षक को उसके पास भेजा, और वही नौकर चाय की ट्रे लेकर सामने आया. बातचीत के बाद उसे वहां से वापस लाया गया. लेकिन जिस व्यक्ति पर भरोसा कर उसे घर में रखा गया था, वही जब इस प्रकार का छल कर बैठा, तो पापा के लिए यह असहनीय था. उन्होंने उसी क्षण उसे अपने घर से बाहर निकाल दिया.
वहीं, वह मुस्लिम लड़का आज भी एक विश्वासपात्र इंसान के रूप में हमारे परिवार से जुड़ा हुआ है. वह हमारे घर से पढ़-लिखकर निकला और अपने पैरों पर खड़ा होकर एक अच्छा जीवन और सम्मानजनक रिश्ता बनाकर गया.
यह अनुभव यही सिखाता है
धर्म इंसान को नहीं, उसकी नीयत तय करती है.
जब नीयत साफ़ हो, तो मजहब कभी दीवार नहीं बनता.

डॉ. निवेदिता श्रीवास्तव, गार्गी, जमशेदपुर