यदि हम बात विद्या की करें तो, यह जिसका वास्तविक अर्थ है जानना,खोजना,समझना , प्राप्त करना,अब मनुष्य क्या जानना चाहता………!, क्या खोज रहा ………!,क्या उसने प्राप्त कर लिया …………! और क्या वह जीवन में इस से समझ पाया………….!!
यदि सच पूछें तो, आज स्थिति यह है कि, वह स्वयं को भी सही से नहीं जान पाया । नहीं जान पाया वह कि, ईश्वर की बनाई प्रत्येक वस्तु और प्राणि में उसी का अंश है। सभी में एक आत्मा का निवास है। जो न तो छोटी होती है ,न बड़ी न अमीर होती न गरीब। न किसी से द्वेश रखती है और न ही किसी से बैर । वह केवल अपने बाह्य ज्ञान को ही सर्वोपरि मानकर छल कपट करता एवं दूसरों से बैर भाव रखता आया है। भौतिक वस्तुओं का उपार्जन अधिक से अधिक कर स्वयं को श्रेष्ठ दिखाना चाहता है । अपने से नीचे वालों को हीन भावना से देखता है उसका झूठ और छल कपट दिन प्रतिदिन चरम सीमा पार करते जा रहे हैं और वह, ज्ञानी होने का स्वर्ण पदक लिए स्वयं को अभिमान के मद में चूर कर, दुनिया का श्रेष्ठ व्यक्ति कहलाने की होड़ में, समस्त मित्र समाज रिश्ते नाते यहां तक कि , मानवता की बलि चढ़ा देता है। यही सबसे बड़ी विडंबना है कि, ऐसा मनुष्य कोरा अज्ञानी ही रहता है, और अंत में ,परिणाम मानसिक कुंठा…..! आत्मग्लानि…..! आत्मदाह ……! जैसी भयावह परिस्थितियों का जन्म।
विद्या केवल आपको तकनीकी खोज या भौतिक सुखों की प्राप्ति हेतु ज्ञान ही नहीं देती ,अपितु विद्या का अर्थ सबसे पहले स्वयं को जानना है । विद्या स्वयं को स्वयं में खोजना और समझना सिखाती है । यही सिखाती है कि, समस्त प्राणी जगत एक ईश्वर की बनाई गई कृति हैं जिसमें, एक समान आत्मा निवास करती है जो,पूर्णतः शुद्ध स्वच्छ निर्मल है।इस माटी की काया और उसके निवासी मन मस्तिष्क हृदय तो क्षणिक हैं जिनका आज से कल का भरोसा नहीं।यदि आपके लिए कोई ग़लत बोले या आपके साथ कोई कुछ भी ग़लत करे तो, इसमें स्वयं को दुखी करना और उसके साथ वैसा ही व्यवहार करने की अपेक्षा, आप उसको करने दीजिए जो भी वह कर रहा है। क्योंकि ईश्वर के दिए इस शरीर रुपी चोले को मलिन हम कर रहे,किसी के लिए बुरा सोचकर ,बोलकर और वैसा व्यवहार करके।
यदि वास्तव में हमने यह आंतरिक दर्शन की विद्या ग्रहण कर ली तो हमारे आसपास की समस्याएं स्वत: ही सुलझ जाएंगी ।क्योंकि विद्या अथवा सच्चा ज्ञान जब आपको हो जाता है, तब न तो आपको किसी की बुराई नजर आती न कमियां क्योंकि उससे पहले आप स्वयं को उस कसौटी पर रखकर तौलने लगते हैं
हम अपने धर्म ग्रंथों में कहने को प्रतिदिन कुछ न कुछ पढ़ते हैं संत महात्मा पुरुषों के प्रवचन सुनते हैं केवल उन्हें पढ़कर शोर मचाना या प्रवचन देना या सुनना मात्र आपको ज्ञानी नहीं बनाता .....!
यह कार्य तो इस आधुनिक युग में चरम सीमा पर है अपितु, इन सभी से कुछ सीखना, समझना और इन्हें वास्तव में जीना यह अत्यंत महत्वपूर्ण है और यदि सच पूछिए ! तो वास्तविकता में मेरे दृष्टिकोण से यही सच्ची विद्या है । और जो इन सभी का मात्र दिखावा कर औरों का मार्गदर्शन कर रहा तो मित्रों! वह स्वयं भी अज्ञानी ही कहा जाएगा क्योंकि उसके नकारात्मक भावों की ऊर्जा कहीं न कहीं दूसरों को प्रभावित अवश्य करती है।

सीमा शर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, नोएडा (उत्तरप्रदेश)