ज्ञान का कलित वर्णन

यह कविता ज्ञान को रूप, रस, शब्द, अनुभव और विवेक के समग्र स्वरूप में प्रस्तुत करती है। बालक के ‘क, ख, ग’ से लेकर विद्वान की विरासत तक ज्ञान को जीवन, संघर्ष, विनम्रता और सहानुभूति की निरंतर यात्रा के रूप में रेखांकित करती है।

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हस्‍तरेखा

मां के बहुत कहने पर उसने बाबा के सामने हथेली फैलाई। बाबा ने ध्यान से रेखाएँ देखीं और मुस्कराए
“अरे वा! बहुत सुंदर रेखाएँ हैं बिटिया, खूब सुख-संपत्ति और अच्छा पति मिलेगा।” वह अचानक बीच में बोल उठी—“विद्या की रेखा कहाँ है मेरे हाथ में, बताइए तो ज़रा?”बाबा ठिठक गए।“बिटिया, तुम्हारे नसीब में सब कुछ है, विद्या को छोड़कर।”उसकी आँखों में चमक आ गई।

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जो खुद को नहीं जाना, उसने कुछ नहीं जाना!

विद्या का वास्तविक अर्थ केवल तकनीकी ज्ञान या भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। यह सबसे पहले स्वयं को जानने, समझने और जीवन के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को खोजने की प्रक्रिया है। यदि हम स्वयं को और समस्त प्राणी जगत को एक ईश्वर की रचना मानकर देखें तो जीवन की अधिकांश उलझनें स्वतः समाप्त हो जाती हैं। विद्या वही है जो हमें भीतर से शुद्ध बनाए, आत्मा को जानने का अवसर दे और बाहरी दिखावे के मोह से दूर रखे।

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