“देह, निर्णय और दरारें”

पितृसत्ता के भीतर की स्त्री और पुरुष की कैद”

पितृसत्ता केवल एक सामाजिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी मानसिक संरचना है जो सत्ता, श्रेय, अधिकार और पहचान को पुरुष की जैविकता से जोड़कर देखती है. यह एक ऐसा वर्चस्व है जो स्त्री को अन्य बनाकर उसके श्रम, उसके निर्णय और उसकी देह तक पर नियंत्रण चाहता है. यह लेख पितृसत्ता की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और वर्तमान सामाजिक परतों को विश्लेषित करने का एक प्रयास है. एक ऐसा प्रयास जो यह पूछ सके कि हम कब और कैसे मनुष्य से पुरुष या स्त्री में विभाजित हुए?
इतिहास की जड़ों में पितृसत्ता:
पितृसत्ता का उद्भव कब हुआ, यह एक बहस का विषय है. किंतु इतिहास के प्रारंभिक स्रोतों और मानवशास्त्रीय अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि आरंभिक मानव समाज अधिकतर मातृसत्तात्मक या साझी सत्ता आधारित थे. स्त्री को जीवनदात्री और प्रकृति के साक्षात रूप में देखा जाता था. किंतु कृषि क्रांति, निजी संपत्ति की अवधारणा और उत्तराधिकार के प्रश्नों ने वंश को केंद्र में लाकर पिता को प्रमुख बना दिया.
पुरुष युद्धों में गया, शिकार लाया और परिवार का पालक माना जाने लगा. इस भूमिका ने धीरे-धीरे सत्ता को पुरुष के हाथों सौंप दिया. स्त्री को घर और पुरुष को बाहर का प्रतिनिधि बना दिया गया. यहीं से स्त्री के लिए नियम बने, उसकी इच्छाओं पर संदेह किया गया, और इज़्ज़त को उसकी देह से जोड़ दिया गया.

धर्म और पितृसत्ता : नैतिकता का औज़ार है.
लगभग सभी धर्मों ने पितृसत्ता को एक दैवी व्यवस्था के रूप में प्रतिष्ठित किया. मनुस्मृति कहती है, ङ्गङ्घस्त्री स्वाधीन नहीं हो सकती, न बचपन में, न युवावस्था में, न वृद्धावस्था में.अब्राहमिक धर्मों में भी आदम के लिए हव्वा की उत्पत्ति की कथा यह स्थापित करती है कि स्त्री पुरुष की सहायता मात्र है. इस तरह धर्म ने नैतिकता के नाम पर स्त्री की स्वतंत्रता को संदेह के घेरे में रखा.
मज़ेदार बात यह है कि धार्मिक ग्रंथों में जितना स्त्री को वंदनीय बताया गया, उतना ही उसे नियंत्रित भी किया गया. वह देवी हो सकती है, किंतु निर्णयकर्ता नहीं. वह शक्ति है, किंतु राजनीति में नहीं. इस दोहरापन पितृसत्ता का सबसे शातिर रूप है. जब स्त्री को पर रखकर उसे निर्णय से वंचित किया जाता है.

भाषा, संस्कृति और मिथक में पितृसत्ता
हमारी भाषा और लोकसंस्कृति पितृसत्ता से इतनी गहराई में बसी है कि हम उसे पहचान भी नहीं पाते. उदाहरण के लिए:
लड़की तो पराई अमानत है मानो लड़की न हो, कोई वस्तु हो जो किसी और की मिल्कियत है.
घर की इज़्ज़त बेटी के हाथ में है पुरुष का आचरण, हिंसा, बलात्कार सब म़ाफ, पर लड़की ने अगर प्रेम कर लिया तो इज़्ज़त मिट्टी में!
लोकगीतों में स्त्री का दुःख, पीहर की याद, और ससुराल की पीड़ा, पर निर्णय लेने की कहीं कोई स्वतंत्रता नहीं.
भारतीय मिथकों में भी द्रौपदी, सीता, अहिल्या सभी पितृसत्ता की शिकार हैं. राम जैसे आदर्श पुरुष भी अंततः स्त्री की शुचिता पर संदेह करते हैं, और समाज का भय स्त्री को वनवास देता है.
शिक्षा और न्याय व्यवस्था में पितृसत्ता

शिक्षा प्रणाली, जिसे स्वतंत्रता और विचारशीलता का माध्यम माना जाता है, वही पितृसत्ता के सबसे गुप्त वाहकों में है. पाठ्यपुस्तकों में लड़कियाँ सुघड़ गृहिणी, त्यागमयी माँ और सुंदर पत्नी के रूप में चित्रित होती हैं; लड़के वीर, नेता और आविष्कारक.
कानून व्यवस्था भी लिंग-तटस्थ नहीं रही है. बलात्कार की परिभाषा लंबे समय तक केवल पुरुष द्वारा स्त्री के साथ ही जुड़ी रही. वैवाहिक बलात्कार आज भी भारत में अपराध नहीं माना जाता. न्यायिक व्यवस्था तब तक चेतती नहीं जब तक ङ्गनिर्भयाफ जैसी घटनाएं उसे झकझोर न दें.

आधुनिकता में छिपी पुरातन पितृसत्ता
आज स्त्रियाँ डॉक्टर हैं, नेता हैं, अंतरिक्ष में जा रही हैं, फिर भी कितनी स्त्रियाँ हैं जो अपने पहनावे, बाहर निकलने के समय या प्रेम के चयन में पूर्णतः स्वतंत्र हैं?वर्किंग वुमन आज भी दोहरी ज़िम्मेदारियों का बोझ ढोती है. दफ्तर और घर दोनों. पुरुष अगर रोटियाँ बेलता है तो वह ङ्गकूलफ है; पर स्त्री का काम कर्तव्य है

सोशल मीडिया पर फेमिनिज़्म के नाम पर जो विमर्श हो रहा है, वह कई बार सतही और ब्रांडेड होकर रह गया है. स्त्री की स्वतंत्रता को अब उपभोग के नए रूपों में समेटने की चेष्टा हो रही है. सुंदरता, फिटनेस, किचन क्वीन, बॉसी बनो पर मूलभूत संरचना नहीं बदली. मनोविज्ञान और पितृसत्ता : भीतर की गुलामी
पितृसत्ता केवल बाहर की व्यवस्था नहीं है, वह भीतर का संस्कार है. एक स्त्री जब कहती है. मेरा बेटा बहू से काम नहीं करवाएगा वह पितृसत्ता के लिए जड़ें सींच रही होती है.
पुरुषों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि भावुकता कमज़ोरी है, रोना स्त्रियों का काम है और यहीं से एक असंवेदनशील पुरुष बनता है, जो निर्णय करता है, पर सहानुभूति नहीं रखता.
स्त्रियाँ भी अच्छी लड़की बनने के लिए अपने निर्णयों को टालती हैं. समाज से मिली भूमिका को ही प्रेम मानने लगती हैं . जैसे पति की सेवा प्रेम है, या माँ बनना ही स्त्री की पूर्णता है. यह आंतरिक पितृसत्ता है. जिसे पहचानना सबसे कठिन है.
पितृसत्ता से मुक्ति : केवल स्त्री का संघर्ष नहीं
यह धारणा भी स्वयं पितृसत्तात्मक है कि पितृसत्ता से मुक्ति केवल स्त्रियों का संघर्ष है. यह पुरुषों को भी अवमानव
बना रही है. उन्हें हिंसा, नियंत्रण और निर्णय का दबाव देकर. उन्हें भी आदर्श पुरुष बनने के नाम पर संवेदना से काट दिया गया है.
पितृसत्ता से मुक्ति का अर्थ है, एक ऐसा समाज जहाँ किसी को केवल उसके लिंग के आधार पर परखा न जाए. जहाँ लड़कियाँ निर्णय कर सकें, और लड़के भी आँसू बहा सकें. जहाँ माँ-बेटी के रिश्ते में कर्तव्य नहीं, संवाद हो. जहाँ विवाह, प्रेम और मातृत्व विकल्प हों, अनिवार्यता नहीं.
नारीवाद बनाम पितृसत्ता : संघर्ष या संवाद?
नारीवाद (फेमिनिज़्म) को पितृसत्ता के विरोध के रूप में देखा जाता है, पर वास्तव में वह समता और स्वतंत्रता का आंदोलन है. यह केवल स्त्रियों की मुक्ति की बात नहीं करता, बल्कि पूरे समाज की सोच को मानवीय बनाने की चेष्टा करता है.
पितृसत्ता से लड़ाई का मतलब पुरुष-विरोध नहीं है, बल्कि सत्ता-विरोध है. वह सत्ता जो किसी एक वर्ग को श्रेष्ठ मानती है.
इसलिए जब भी कोई पुरुष पितृसत्ता के विरुद्ध आवाज़ उठाता है

वह नारीवाद का सहयोगी बनता है.
क्या समाधान है?

पितृसत्ता एक दिन में नहीं बनी, इसे तोड़ना भी एक सतत प्रक्रिया है. इसके लिए:-
परिवार से शुरुआत करनी होगी. बेटियों को विकल्प, और बेटों को संवेदना देनी होगी.शिक्षा प्रणाली को लिंग-संवेदी बनाना होगा.
स्त्री के ऐतिहासिक योगदान को शामिल करना होगा.कानून को संवेदनशील और त्वरित बनाना होगा.
धर्म और संस्कृति की आलोचनात्मक पुनर्व्याख्या करनी होगी.
मीडिया को सजग और जिम्मेदार होना होगा. हमें अपने भीतर की पितृसत्ता को पहचानना होगा. जब कोई स्त्री चुपचाप अत्याचार सहती है, या जब कोई पुरुष अपने आँसू छिपाता है. दोनों ही पितृसत्ता की गिरफ्त में हैं.


वो ताज उछालो. ये गद्दी, ये सिंहासन बाँटो
आदमी को आदमी बनने दो, औरत को औरत रहने दो. मत बाँधो उसे मर्यादा में, मत ढोओ स्वामित्व,मत कहो कि तुम उसके रक्षक हो. वह अपनी रक्षक स्वयं है.

नीना अंदोत्रा, प्रसिद्ध लेखिका, अहमदाबाद

2 thoughts on ““देह, निर्णय और दरारें”

  1. सही है,यह व्यवस्था और अवस्था एक दिन में नहीं बनी इसे बदलने में समय भी लगेगा और इस बदलाव में संपूर्ण समाज की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। एक बहुत ही सार्थक आलेख।

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