
विजयलक्ष्मी सिंह
घुँघरू की सुंदर प्रतिध्वनि
कानों को लगती प्रिय इतनी,
यह नृत्यकार के चरणों में
झंकृत होती है लगातार।
स्वर, लय, संगीत से सजी हुई,
चरणों की थाप से बँधी हुई,
जब एक कहो तो बाजे एक,
नृत्यकार के मनोभाव अनेक।
कभी शौक में बँधे पग में,
कभी नृत्यांगना के आँगन में,
बज-बजकर जब ये बंद हुए,
सुनसान डगर उस जगह हुई।
कभी प्रेम-पगी मीरा को बँधे,
कभी विरहन को बैरन से लगे,
नूपुर महफ़िल का शृंगार बने,
कभी मन को झंकृत कर गए।
कभी कथक नृत्य के बोल बने,
तबले पर ताताथेई से लगे,
हर थाप पर बोले ताता थेई,
घुँघरू से मन को मिली खुशी।
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घुँघरू के सर्व आयामी पक्षों की सुन्दर अभिव्यक्ति
बहुत ही सुन्दर रचना