
डॉ. नलिनी शर्मा ‘कृष्णा’
मैं, मेरा काम, मेरी तन्हाइयाँ,
मुझको रास आती हैं।
तेरे होने या न होने से
मुझे फ़र्क नहीं पड़ता है।
हाँ, कुछ देर तुझसे
बात कर लेने से
सुकून ज़रूर मिलता है,
पर तेरा वक्त न देना
मुझे फ़र्क नहीं पड़ता है।
एहसास बहुत है
तेरे साथ का,
जब तेरा हाथ
मेरे हाथ में होता है।
किन्तु तेरा हाथ
साथ न देना भी
मुझे फ़र्क नहीं पड़ता है।
सच है, मैं बहुत बोलती हूँ,
बहुत हँसती हूँ,
बेइंतहा मज़ाक करती हूँ।
किन्तु शांति को सुनना,
ज़्यादा न बोलना
मुझे फ़र्क नहीं पड़ता है।
हाँ, बल्कि शांति में,
बिना किसी शोर-शराबे के,
चुपचाप अपलक
तुझे निहारते हुए बैठना
अच्छा लगता है।
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