
पूनम सिंह वत्सला, जमशेदपुर
नाव बनाकर किताब को
तलाश रहे परिवार को
सुनाई पड़ी रुदन अपनों की,
बह रहे हैं आँसू मेरे नैनों की।
जब प्रकृति ने धारण किया
अपना विकराल रूप,
सहम गया मनुष्य ही क्या,
पशु-पक्षी, जीव-जंतु अंधकूप।
नदी, सागर, झील सब
उफान पर आए,
पहाड़ों-पर्वतों को भी
क्या अचानक थर्राए।
घर, मकान, परिवार सब
बहा ले गए साथ,
दुःख, कष्ट और विपदा
आए सब मेरे माथ।
कहीं कोई अपनों को ढूँढ़े,
कहीं कोई बिलखाए,
कहीं विलाप, कहीं रुदन,
कहीं क्रंदन सुनाई दे जाए।
मनुष्य में प्रकृति के कहर
को समझ पाना,
सोच अपना सुख का साधन,
भूल गया उसके संतुलन से
जुड़ा है अपना भी जीवन।
पेड़ों को काटा, नदियों को पाटा,
मैला किया मुझे बार-बार।
पूछ रही प्रकृति, क्यों करते हो
मुझसे तुम खिलवाड़?
प्रकृति बचाओ, तभी बचेगा
मानव और यह संसार।
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