
डॉ. मंजूलता, नोएडा
एक वो रात थी,
तुम थे, मैं थी,
सुहानी रात थी।
आसमान में चाँद-तारे थे।
चाँद की सुनहरी किरणों के तुम्हारे
मुखमंडल पर पड़ते ही
तुम्हारा गेहुँआ रंग
दमक उठता था।
तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में
और सिर मेरे कंधे पर टिका होता था।
बेफ़िक्री, कोई संवाद नहीं,
मौन की भाषा
मौन ही समझ पा रहे थे।
कोई हलचल नहीं,
पूरा का पूरा कायनात
हमारा साक्षी था।
और एक रात ये है
न तुम हो, न हम हैं,
न वो रौनक है।
चाँद-तारे भी मायूस
नज़र आते हैं।
न ही कायनात हमारे
पक्ष में है।
सब विपरीत नज़र
आते हैं…
बस स्मृति ही रह गई,
जो मीठी-मीठी टीस
दिया करती है।
तुम्हीं कहो,
इन्हें कैसे हटाऊँ?
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माँ
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श्रद्धा का विराट कारवां,. तप की यात्रा

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