
डॉ रंजना शर्मा, हुगली
सुनो मेरे रहबर!
तुम्हारी दी हुई सज़ा
न जाने कैसे मज़ा बन गई।
सोचा तो तुमने यही था
कि तोड़ दोगे चूरे-चूरे में
मदमस्त वजूद को ही।
पर जानते हो, मेरे प्यारे रक़ीब!
होना ही चाहिए हर किसी के पास
सज़ा जीने का एक बड़ा ही खूबसूरत-सा अंदाज़।
वो सज़ा ही क्या, जिसमें तड़प की आहें
न पहुँचती हों आसमान की सरहदों तक।
वह अंदाज़ ही क्या, जो सिर्फ़
मखमली राहों पे चले और आग़ाज़ ही न बने।
वह इश्क़ भी क्या,
जिसमें खुद से ही इश्क़ करने की तलब ही न बचे।
ईमान से कहता हूँ, मेरे प्यारे रक़ीब!
तुम्हारी बेइंतहा मोहब्बत ने,
जो तुमने कभी किया ही न था,
सच में माशूका बना दिया।
हर वो रास्ते, जिसे तुमने ठुकरा दिया बेज़ार तल्ख़ में,
कि जल जाए बुलबुल क़फ़स में।
पर इन्हीं जलते हुए रास्तों ने
फिर से उसे फिनिक्स बना दिया।
कसम है अलग-अलग रास्तों की,
पेड़ छायादार तुम्हें हो मुबारक, मेरे अज़ीज़ों!
बीज संभावनाओं का भर के मुट्ठी में—
कोलंबस,
फिर से एक नए सफ़र पे निकल गया।
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