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कमाऊ बहू 

ससुर ने जेठानी और देवरानी के विवाद में सुनाया बड़ा फैसला जेठानी-देवरानी के विवाद में ससुर ने लिया न्यायपूर्ण फैसला.

अंजू ओझा

फूलझड़ी कुटीर को झिलमिलाती रोशनी से सजाया-सँवारा गया है। घर में सभी लोग रोहित की बारात निकलने की तैयारी में जुटे हैं। रोहित अपने कमरे में तैयार हो रहा है। मनपसंद लड़की उसकी जीवनसंगिनी बनने जा रही है। रुचि उसी के साथ एक ही ऑफिस में काम करती है और उसके समकक्ष कमाती है।

रोहित की माँ रुक्मिणी जी काफी उत्साहित हैं कि उनकी छोटी बहू कमाऊ है और सगे-संबंधियों से इतराकर कह रही हैं कि कमाऊ पतोहू आएगी तो घर साजो-सामान से भर देगी। लक्ष्मी है वो।

“बड़ी बहू क्या है भई? आपने तो उसे बाहर काम करने नहीं दिया था। अब आपका हृदय परिवर्तन हो गया है और खुशी के गीत गाए जा रही हैं कि कमाने वाली बहू आ रही है। बहुत चोन्हा (इतराना) रही हैं आप!”

ननद रीमा ने अपनी भाभी रुक्मिणी पर कटाक्ष किया, लेकिन रुक्मिणी कन्नी काटकर निकल गईं।

बड़ी बहू ललिता साक्षात सरस्वती का स्वरूप, विदुषी महिला थी। बीएड और एमएड की डिग्री होने के बावजूद सास ने उसे नौकरी करने से साफ तौर पर मना कर दिया था। यह कहकर कि, “हमें बहू की कमाई नहीं खानी है। हमें घर सँभालने वाली लड़की की दरकार है।”

ललिता ने खामोशी से अपनी काबिलियत को तिलांजलि दे दी थी और सास-ससुर, ननद-देवर की सेवा करती आ रही थी। अब समय करवट ले रहा था।

दूसरे दिन रुचि बहू बनकर आ गई। ललिता भी खुश थी कि उसके समकक्ष ही देवरानी आई है। उसमें अपनी छवि देखकर जेठानी बनकर प्रफुल्लित थी कि चलो, कोई तो उसे चाय बनाकर देगा और रसोईघर में मदद करेगा।

लेकिन ललिता को उसके रंग-ढंग और आचरण-व्यवहार दूसरे दिन ही समझ आ गए थे।

रुचि को मुँह दिखाई की रस्म में काफी नकद, ज्वेलरी और कपड़े मिले थे। बैठक में यह कार्यक्रम समाप्त होने के बाद देवर रोहित बोल रहा था—

“मम्मी, मुँह दिखाई के गिफ्ट पर रुचि का हक है ना? कल रिसेप्शन पार्टी में भी गिफ्ट्स मिलेंगे ही, तो उसे आप सब रख लेना।”

रोहित की बात से वहाँ बैठे ससुर, ललिता के पति रोहन, सास और ननद ने हामी भरी, लेकिन ललिता का मन कचोट रहा था। रोहित की बात सुनकर उसके हृदय को ठेस लगी थी कि उसकी शादी में पति रोहन ने यह नहीं कहा था कि शादी में मिले उपहार पर ललिता का हक है। आज देवर बेबाकी से अपनी पत्नी को मिले सामान की बंदरबाँट कर रहा था।

सास भी रुचि को खुश करने के चक्कर में भूल रही थीं कि उनके दोहरे आचरण को लेकर ललिता का दिल कलपता है।

शादी में आए रिश्तेदार जा चुके थे। घर में सास-ससुर, ललिता और रोहन, दो बच्चे, साथ में रोहित और रुचि थे।

ऑफिस जाने के वक्त अफरातफरी मची रहती। सुबह छह बजे से लेकर दस बजे तक ललिता चक्करघिन्नी की भाँति सारे काम निपटाती। सास कुछ नहीं करतीं, न रुचि घर के कामों में हाथ बँटाती।

रोहित प्रतिदिन रुचि के साथ ऑफिस चला जाता। रुचि ललिता और सास को, “बाय मम्मीजी, बाय भाभी,” कहते हुए ठसक में रहती। अपना हाथ हिलाते हुए निकल जाती। ललिता के हाथों का बना नाश्ता करती और अपना तथा रोहित का लंच पैक कर लेती और बैग हिलाते हुए ऑफिस चली जाती।

हद तो तब हो जाती जब सास की शह पर वह भी ललिता की गृहकार्य में मदद नहीं करती। शाम को कुछ करना भी चाहे तो सास मना कर देतीं—

“सब ललिता कर लेगी। उसे काम करने की आदत है। तुम थक जाती होगी, इसलिए अपने कमरे में जाकर आराम करो।”

और देवर भी कुछ नहीं बोलता।

ललिता यह सब भेदभाव देखकर कुढ़ती, पर अपने पति से कुछ नहीं बोल पाती, क्योंकि रोहन को औरतों के मामले में बोलना पसंद नहीं था। न ही उन्होंने कभी कुछ कहा था।

ससुर भी गंभीर स्वभाव के थे। उन्होंने भी घर के अंदर क्या हो रहा है, इसमें कभी हस्तक्षेप नहीं किया था।

अब सिर के ऊपर पानी जा रहा था। यदि इस बार नहीं बोलती तो दोनों का, देवर-देवरानी का, मन बढ़ता जा रहा था और अब इनकी उच्छृंखलता पर लगाम कसना जरूरी था।

हुआ यूँ कि ललिता सुबह के नाश्ते में इडली बनाती है और गर्मागर्म सांभर-इडली अपने दोनों बच्चों को देने के लिए प्लेट लगा रही थी। उसी समय रसोईघर में रुचि आती है।

“भाभी, मेरे और रोहित के लंच पैक कर दीजिए ना। मेरे लंच बॉक्स में दस-बारह इडली डाल दीजिएगा। अपनी कलीग को खिला दूँगी और रोहित को चार इडली दे दीजिए। दूसरे डिब्बे में सेब और खीरा दे दीजिएगा।”

मतलब, जेठानी को फरमाइश/ऑर्डर देने की आदी रुचि बड़े आराम से कहकर मुड़ने को हुई।

“अभी तो एक पारी ही इडली निकली है। शुभम और सुहाना को दे रही हूँ। ऐसा करो रुचि, तुम फ्रूट्स वाला लंच बॉक्स तैयार कर लो और दुबारा इडली दस मिनट में तैयार हो रही है। तब तक रुकना होगा, ठीक है ना रुचि?”

“अरे भाभी, ये दोनों तो घर में ही हैं ना। मुझे देर हो रही है और रोहित को भी अपने बॉस के साथ दूसरी जगह साइट पर जाना है। आप ऐसा करिए, शुभम-सुहाना की इडली लंच में दे दीजिए और दूसरी पारी वाली आप इन्हें खिला देना।”

यह कहते हुए वह प्लेट में रखी इडली को टिफिन में रखने लगी।

ऐसा करते देख ललिता को काटो तो खून नहीं।

सुबह से किचन में पसीने से लथपथ होकर नाश्ता तैयार कर रही हूँ और ये महारानी जी मेरे ही बच्चों के मुँह से निवाला छीन रही हैं। बर्दाश्त की भी सीमा होती है।

ललिता ने झट से रुचि का हाथ पकड़ लिया।

“सुनो रुचि, आज से और अभी से तुम अपना नाश्ता, खाना और डिनर खुद बनाना। सासुजी को तुम बहुत पसंद हो, इसलिए उनकी जिम्मेदारी भी तुम्हीं निभाओ। और हाँ, अब से मैं तुम्हारे लिए खाना नहीं बना सकती, न देवर के लिए बनाऊँगी। तुमने मेरे सब्र का बाँध तोड़ दिया है। आज शाम को फैसला मेरा होगा कि मुझे तुम्हारे साथ रहना है या नहीं। तुम कमाती हो अपने लिए, न कि मेरे लिए या मेरे बच्चों के लिए।

इसलिए खबरदार, रुचि! मेरे रसोईघर में आई तो!”

इतना सुनते ही गुस्से में लाल होकर रुचि झनझनाती हुई अपने कमरे में चली गई। जोर-जोर से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आने लगीं।

रोहित उसे शांत होने के लिए कहता है, लेकिन रुचि अपनी मान-मर्यादा भूलकर रोहित को तू-तड़ाक और न जाने कितने अपशब्दों से नवाजती है। देवर भीगी बिल्ली बनकर खड़ा है।

सास गई हैं रुचि को समझाने, लेकिन उल्टे रुचि उन्हीं पर चढ़ बैठी।

“मम्मी, मेरे खाने-पीने का हिसाब-किताब किया जा रहा है। मेरी कमाई को लेकर ताना मारा जा रहा है। अब मैं इस घर में नहीं रह सकती।”

“लेकिन बेटा, हुआ क्या?”

सारा वाकया नमक-मिर्च और हींग के तड़के के साथ सास को परोसा जा रहा था। वह रुचि की हाँ में हाँ मिला रही थीं और इसलिए उसके सुर में सुर मिलाती जा रही थीं।

“कमाऊ बहू कभी बैग, सिल्क की साड़ी, ज्वेलरी लाकर देती थी और ललिता कहाँ से लाती? वह तो कमाती नहीं थी।”

“ठीक है बेटा, तुम शांत हो जाओ। रात में सबके सामने अपनी बात रखना।”

दोनों तनाव में थे, इसलिए ऑफिस नहीं गए।

रात में रोहन ऑफिस से आते हैं, तब सब लोगों को हॉल में इकट्ठा होने के लिए कहा जाता है।

सास-ससुर, रोहन और रोहित वहाँ हैं। ललिता भी एकदम शांत बैठी है और रुचि रो-रोकर मुँह सुजाए खड़ी है। मानो उसके सिर पर मनों विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा हो। खुद को बेचारी जैसी दिखा रही है और ललिता रणचंडिका का रूप धारण किए हुए है। आर या पार।

ससुर पूछते हैं—

“क्या हुआ बड़ी बहू?”

“आप मुझसे पूछिए ना, क्या हुआ।”

बीच में सास की कर्कश बोली सुनकर ससुर उन्हें डाँटते हैं—

“चुप हो जाओ रुक्मिणी! तुम्हारी दुष्टता के कारण ही आज हमारा घर महाभारत का अखाड़ा बना हुआ है। और तुम बड़ी बहू की तुलना छोटी से क्यों करती हो? ललिता ने कभी तुमसे ऊँचे स्वर में बात की है? कभी भी तुम्हारी या मेरी सेवा-टहल में कमी की है?

आज ऐसी स्थिति की जिम्मेदार तुम हो। कहाँ ललिता और कहाँ तुम! रुचि से भी उसकी कोई तुलना नहीं है और न तुमसे।”

“चार महीने से आई है छोटी बहू। कितनी बार रसोईघर की तरफ झाँकी हो? ललिता ने सब कुछ तुम लोगों के लिए निःस्वार्थ भाव से किया है। उसका यह मूल्य चुका रही हो तुम। और सास की बात में आकर कर रही हो ना? अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है।”

“सास के साथ पार्टी मजबूत बनाकर खुश हो रही हो ना? तो मैं आज से यह घर बाँट रहा हूँ। ऊपर की मंजिल पर दो कमरे हैं, बाद में और दो कमरे बनवा दूँगा। घर में सुख-शांति चाहती हो तो रोहित, तुम और रुक्मिणी ऊपर शिफ्ट हो जाओ। ललिता मेरे साथ रहेगी और दोनों पोता-पोती भी मेरे साथ रहेंगे। रोहन तो मेरा खून है, गाय जैसा सीधा है, इसलिए उसे भी मैं अपने साथ रखूँगा।”

“रोहित, तुम अपनी बीवी के पैसे पर नाज कर रहे हो ना? पैसे से ही पेट नहीं भरता, बल्कि हाथ-पैर भी चलाना जरूरी है।”

“रुचि बहू ने बहुत बड़ा पाप किया है। बड़ी बहन जैसी जेठानी को अंडरएस्टिमेट कर खून के आँसू रुलाए हैं, जिससे आज कठोर फैसला लेना पड़ा है।”

“ललिता भी हाई क्वालिफाइड है। शायद उसने अपनी सास की बात का मान रखा और नौकरी नहीं की। और तुम जो पैसे का घमंड करती हो ना, तो जान लो, इसके पिता ने एक फ्लैट दिया है और महँगे-महँगे संस्कार और तहजीब भी दी है। शायद तुम्हारे माता-पिता तुम्हें देना भूल गए।”

ससुर की बात से ललिता का रोम-रोम ससुर जी के प्रति अतिशय श्रद्धा से झुक गया। उसका हृदय भी आह्लादित था।

ससुर कभी भी घरेलू मसले में नहीं बोलते थे, लेकिन आज वह अपनी बड़ी पतोहू के लिए दुनिया के बेस्ट फादर-इन-लॉ दिख रहे थे। न्याय की मूर्ति बनकर, न्यायाधीश के रूप में उन्होंने सही फैसला सुनाया था।

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