
सुरेखा अग्रवाल
नीड़ न दो चाहे पिंजरे का।
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो..!
पिंजरबद्ध करके हमको
आकुल उड़ान में विघ्न मत डालो…
जी हाँ, आज़ादी किसे अच्छी नहीं लगती? हम सब किसी न किसी बंधन में बंधे हैं, पर एक निश्चित परिधि के बंधन और आज़ादी रिश्तों को कई घुटन और यातनाओं से बचाते हैं। कहते हैं, एक स्वतंत्र जिंदगी जीने से आप बहुत कुछ सीखते हैं। कल ही तो हम स्वाधीनता दिवस मनाकर बैठे हैं। गुलामी की जंजीर से निकलना अपने आप में एक सुकून भरा अहसास है। स्वतंत्रता के अपने मायने हैं..!
वह स्वतंत्रता किस हद तक आपको जकड़े रहती है और किस हद तक उन्मुक्त करती है, यह आप पर है और अति किसी भी चीज की हानिकारक होती है। मानवीय संवेदनाएँ किसी भी हद तक जा सकती हैं। विचारों का स्वातंत्र्य होना रोक भी लगा सकता है और सकारात्मक उड़ान भी।
लिखने, खाने, रहने की हो या किसी भी तरह की स्वायत्तता, अपनी एक परिधि में अच्छी लगती है। हाँ जी, स्वतंत्र होने में बुराई नहीं है। कितनी हद तक स्वतंत्र होना है, यह आपको तय करना होगा…!
जिएँ और जीने दें। अगर इस मंत्र के साथ स्वतंत्र रहेंगे तो निश्चित ही इस समाज और मानव जाति का कल्याण होने से कोई नहीं रोक सकता..!!
