
शुभा मिश्रा
जब मैंने उसे पहली बार देखा,
अपनी सास की मजदूरी के बदले
चावल लेने मेरे आँगन में आई थी।
लम्बी घूँघट में चेहरा छुपाए,
बड़ी-सी टोकरी पकड़े नई दुल्हन।
साड़ी में ढकी देह,
बाहर दिख रही थीं केवल
उसकी झकाझक गोरी, सुकोमल,
रेशमी लाल चूड़ियों से सजी कलाइयाँ।
इच्छा हुई, चेहरा देखूँ,
किन्तु उसकी सकुचाहट देख
बगैर कुछ बोले टोकरी भर दी मैंने।
सामने ही उसका घर था, किन्तु
फिर वह दिखी नहीं कभी।
आवाज़ें ज़रूर आती थीं देर रात तक,
चीखने, चिल्लाने और रोने की।
पता चला, शराबी पति मारपीट करता है।
सास बीच-बचाव करती, खुद भी चोट खा जाती है।
कई बार देर रात्रि शोर सुन
मन हुआ, सूचना दे दूँ थाने में।
किन्तु उसकी सास की झुर्रियों में अटके आँसू,
उसका कराहता पुत्र-प्रेम मुझे रोक लेता।
औचक एक रात्रि के अंतिम प्रहर
अपने दुखों से मुक्त हो गई उसकी सास।
बहू के विलाप से काँपने लगीं घर की जीर्ण दीवारें।
उस अभागी को पति की यातनाओं से
बचाव करने वाला भी जो न रहा।
एक साँझ पी गई शराब उस शराबी को।
छोड़ गया दो बच्चों और विधवा को,
किन्तु आवाज़ न आई रुदन की उस घर से।
जाने कब मैं उसके आँगन में खुद को पाती हूँ।
उसके चेहरे पर घूँघट नहीं था।
पथराए, निस्तेज मुख पर स्थिरता थी।
अब वह शराब बेचती है,
अंधाधुंध गालियाँ बकती है।
घूँघट तो क्या, शराब पीकर कपड़ों का होश नहीं रहता।
दोनों बच्चों की तुतलाती गालियाँ सुन रीझती है।
सभी लोग कहते हैं, वह अच्छी औरत नहीं।
बहू-बेटियों को उससे दूर रहने की नसीहत देते हैं….
