यादों की पिच पर अब भी खेलता है गिरधारी

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
कल अचानक फेसबुक पर शरद अरोरा की प्ऱोफाइल पर एक तस्वीर और उसके साथ लिखा एक वाक्य नज़र आया. पिता कभी नहीं मरते… उनका नाम हमेशा बेटों के साथ जुड़ा रहता है. कुछ पल के लिए आँखें वहीं ठहर गईं.
दिल ने उस वाक्य को पढ़ तो लिया, लेकिन स्वीकार नहीं कर पाया. लगा, शायद कुछ गलत समझ रहा हूँ. बार-बार वही पोस्ट पढ़ी… फिर जैसे भीतर किसी ने बहुत धीरे से कहा
गिरधारी नहीं रहा…
यक़ीन मानिए, उस क्षण ऐसा लगा जैसे बचपन का एक पूरा मौसम अचानक ख़त्म हो गया हो.
गिरधारी…
नहीं, वह स़िर्फ एक इंसान नहीं था.
वह अपने आप में एक शरारत था… एक खिलखिलाहट… एक ऐसा दोस्त, जो जहाँ होता था, वहाँ हँसी अपने आप चली आती थी.
आज वही शरारत हमेशा के लिए ख़ामोश हो गई.
कुछ महीने पहले ही महिदपुर रोड जाना हुआ था. श्याम गुलाटी जी की दुकान पर बैठा था कि शरद भी वहाँ आ गया. श्याम जी ने मुस्कुराते हुए उसकी ओर इशारा करके पूछा-जानते हो इसे?
मेरे कुछ कहने से पहले ही शरद मुस्कुरा कर बोला-
हाँ अंकल… मैं जानता हूँ आपको.
मैंने उससे सहज ही पूछ लिया-पापा कैसे हैं?
उसके चेहरे की मुस्कान अचानक धीमी पड़ गई. उसने बहुत छोटे से वाक्य में बहुत बड़ा सच कह दिया-ठीक तो नहीं हैं…
उस दिन शायद मैं उसके चेहरे के पीछे छिपी चिंता पढ़ नहीं पाया था.
लेकिन शरद को देखकर एक बात ज़रूर महसूस हुई थीउसमें मुझे अपने कॉलेज वाला गिरधारी दिखाई दे रहा था. वही मुस्कान… वही चेहरा… वही अपनापन. जैसे समय ने गिरधारी की जवानी को उसके बेटे में सहेजकर रख दिया हो.
कॉलेज के दिनों का गिरधारी…
क्या गज़ब का शरारती था.
हम स्कूल के बाद मिल ग्राउंड में क्रिकेट खेलने पहुँच जाते थे. सच कहूँ तो क्रिकेट से मेरा रिश्ता बहुत गहरा कभी नहीं रहा. निक्कू, सोमनाथ, राकेश कोचर लाला, राजाराम और बाकी दोस्त खेलते थे, इसलिए मैं भी उनके साथ पहुँच जाता था. वैसे भी मुझे कोई अपनी टीम में लेने को तैयार नहीं होता था.
लेकिन गिरधारी चाहता था कि मैं सामने वाली टीम में ही रहूँ.
क्यों?
क्योंकि उसे सबसे ज़्यादा मज़ा मुझे आउट करने में आता था.वह शानदार स्पिन गेंदबाज़ था.आज तक उसकी गेंद का घुमाव मेरी समझ में नहीं आया. मेरी पूरी कोशिश यही रहती थी कि किसी तरह बल्ला गेंद को छू भर ले.
लेकिन गिरधारी…
वह गेंद डालने से पहले ही हँसते हुए कह देता
देखना… आज फिर लगेगी इसको!
और सचमुच…
गेंद टप्पा खाकर ऐसी घूमती कि मैं चाहे जितना बचने की कोशिश करूँ, वह आकर मुझे ही लगती. ऐसा लगता था, जैसे गेंद ने पहले ही तय कर लिया हो कि उसे कहाँ पहुँचना है.
और उसके बाद गिरधारी की वह ठहाके लगाकर हँसने की आवाज़…
आज भी कानों में वैसी ही गूँजती है. ऐसे न जाने कितने किस्से हैं, जो आज यादों के पन्नों से निकल-निकलकर आँखों के सामने खड़े हो गए हैं.
उसका विषय कॉमर्स था और मेरा साइंस.
फिर भी दोस्ती कभी विषयों की मोहताज नहीं रही.कॉलेज के शुरुआती दिनों में हम जनता एक्सप्रेस से इंदौर अप-डाउन करते थे. गिरधारी का स्वभाव इतना मिलनसार था कि कुछ ही दिनों में वह ट्रेन में स़फर करने वाले हर छात्र का चहेता बन गया. बाद में जब वह हॉस्टल में रहने लगा, तब भी वही हाल रहा.
एनएसयूआई के बड़े नेताओं से उसकी ऐसी दोस्ती थी कि पूरा हॉस्टल उसे नाम से जानता था.
और उसका स्टाइल…
क्या कहने!
उस ज़माने में इंदौर में जो फैशन आज आता, कुछ ही दिनों बाद वही महिदपुर रोड में गिरधारी के साथ दिखाई देता.
वह हमारे छोटे से कस्बे का अपना स्टाइल आइकनङ्घङ्घ था.
फिर ज़िंदगी अपनी-अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ गई.
रोज़गार, ज़िम्मेदारियाँ और परिवार…
मुलाक़ातें कम होती चली गईं.लेकिन जब भी कहीं अचानक मिल जाता, वही पुराना अपनापन…वही मुस्कुराहट…
और पहला सवाल-कहाँ है सुरेश तू?
फिर शुरू हो जाती थीं कॉलेज की वही पुरानी बातें…जिन्हें सुनते-सुनते लगता था कि समय शायद रुका हुआ है. कुछ दिन पहले ही उसके दोनों बेटोंशरद और अभय से मुलाक़ात हुई थी. उन्हें देखकर लगा था कि गिरधारी अब भी मुस्कुरा रहा है… बस चेहरा बदल गया है.
लेकिन आज…
आज यह ख़बर भीतर तक तोड़ गई.
कुछ लोग स़िर्फ अपने परिवार के नहीं होते.
वे अपने दोस्तों की यादों का भी हिस्सा होते हैं.
उनके चले जाने के बाद लगता है कि ज़िंदगी की किताब से एक पूरा अध्याय ही गायब हो गया.
गिरधारी…
तू सचमुच चला गया है क्या?
यक़ीन अब भी नहीं होता.
लेकिन तेरी शरारतें…
तेरी हँसी…
तेरी गेंद की वह घूमती हुई स्पिन…
और हर मुलाक़ात में पुकारा गया वह अपनापन-कहाँ है सुरेश तू?
ये सब कभी नहीं जाएँगे. क्योंकि कुछ लोग मरते नहीं…वे अपनी यादों में हमेशा ज़िंदा रहते हैं. और तू भी उन्हीं लोगों में से एक है. ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शरद, अभय और समस्त अरोरा परिवार को इस असहनीय दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें.
ॐ शांति.

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