
रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
पचास वर्ष की सुमेधा की ज़िंदगी बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखाई देती थी। घर था, परिवार था, जिम्मेदारियाँ थीं, लेकिन उसके मन का आँगन बरसों से सूखा पड़ा था। वह उन लोगों में से थी जो सबकी सुनते-सुनते अपनी बात कहना भूल जाते हैं। जिसने दूसरों के लिए जीते-जीते अपने भीतर की इच्छाओं को चुप करा दिया था।
समय के साथ उसने उम्मीद करना भी छोड़ दिया था। न किसी विशेष रिश्ते की चाह थी, न दोस्ती की। उसे लगता था कि जीवन के इस मोड़ पर अब कोई नया अध्याय नहीं लिखा जाता। जो था, बस वही अंतिम सत्य था।
लेकिन नियति अक्सर वहीं बीज बोती है, जहाँ इंसान को लगता है कि अब कुछ नहीं उगेगा।
एक दिन सोशल मीडिया के एक साहित्यिक समूह में उसकी मुलाकात विनय से हुई। उम्र लगभग पचपन वर्ष। शब्दों में शालीनता, व्यवहार में विनम्रता और दिल में गहरी संवेदनशीलता। वह उन लोगों में से था जो जवाब देने से पहले सामने वाले की भावनाओं को समझते हैं।
शुरुआत कुछ सामान्य बातचीत से हुई। कविता, किताबें, बारिश, पुरानी यादें। फिर धीरे-धीरे बातों का दायरा बढ़ता गया।
सुमेधा को आश्चर्य होता था कि विनय बिना कहे उसकी उदासी पहचान लेता था।
“आज कुछ ठीक नहीं है ना?” वह पूछता।
और सुमेधा सोच में पड़ जाती कि आखिर उसने ऐसा क्या कह दिया जिससे यह बात समझ आ गई।
धीरे-धीरे दोनों की बातचीत उनके दिन का सबसे सुंदर हिस्सा बन गई।
विनय ने सुमेधा की सूखी हुई भावनाओं की मिट्टी में फिर से विश्वास का एक छोटा-सा बीज बो दिया था।
लेकिन समाज को ऐसे रिश्ते कहाँ आसानी से स्वीकार होते हैं?
लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए।
“इस उम्र में दोस्ती?”
“लोग क्या कहेंगे?”
“ज़रूर कोई और बात होगी।”
परिवारों ने भी सहजता से इसे नहीं लिया। दोनों को अपनी मित्रता छिपानी पड़ती थी। फोन पर बात करने के लिए समय देखना पड़ता, मिलने के लिए बहाने बनाने पड़ते।
कई बार सुमेधा सोचती कि शायद यह रिश्ता खत्म कर देना चाहिए।
लेकिन फिर उसे एहसास होता कि बरसों बाद कोई तो है जो उसके मन की भाषा समझता है।
विनय भी अक्सर कहता था,
“कुछ रिश्तों को नाम देने की ज़रूरत नहीं होती। उनका होना ही काफी होता है।”
उन दोनों ने अपने लिए एक छोटी-सी दुनिया बना ली थी। इस विशाल ब्रह्मांड से अलग एक शांत कोना, जहाँ कोई निर्णय नहीं था, कोई आरोप नहीं था।
वहाँ केवल दो दोस्त थे।
दो अधूरी कहानियाँ।
दो थके हुए दिल।
और एक ऐसा अपनापन, जो बिना बोले भी सुनाई देता था।
वे साथ बैठकर घंटों हँसते, पुरानी यादों पर बातें करते, भविष्य की कोई योजना नहीं बनाते। उन्हें पता था कि जीवन की शाम में मिले लोग सूरज उगाने नहीं आते, वे डूबते हुए सूरज को खूबसूरत बना देते हैं।
एक दिन सुमेधा ने पूछा,
“क्या तुम्हें कभी डर नहीं लगता कि लोग क्या सोचेंगे?”
विनय मुस्कुराया।
“मुझे उससे ज़्यादा डर उस दिन से लगता है, जब हम समाज के डर से अपनी सच्ची खुशियाँ खो देंगे।”
सुमेधा की आँखें नम हो गईं।
उसने महसूस किया कि प्यार हमेशा हाथ थामने का नाम नहीं होता। कभी-कभी प्यार किसी के मन का बोझ हल्का कर देने में होता है। कभी दोस्ती किसी खाली कमरे में जलते हुए एक छोटे से दीपक की तरह होती है।
उस दिन सुमेधा ने अपने भीतर झाँका।
उसे लगा कि उसके मन की सूखी मिट्टी में सचमुच कुछ अंकुरित हो चुका है।
वह प्रेम था या मित्रता, यह वह नहीं जानती थी।
लेकिन इतना ज़रूर जानती थी कि कुछ रिश्ते जीवन को बदलने नहीं आते, वे जीवन को जीने लायक बना देते हैं।
और शायद यही किसी भी सुंदर रिश्ते की सबसे बड़ी पहचान है।
