
सविता सिंह मीरा,जमशेदपुर
कभी प्रतीक्षा बरसती है
सावन के रूप में,
कभी स्मृतियाँ गरजती हैं
घनघोर मेघ बनकर।
भीगी-भीगी हवाएँ भी
संदेश कई लाती हैं,
मन की देहरी पर चुपके से
दस्तक दे जाती हैं।
पर मन का आँगन न भीगता,
न गूँजता है;
वेदना का दीप वहीं
निःशब्द-सा जलता है।
अधरों पर मुस्कान है,
नयनों में शुष्क समंदर;
भीतर कोई रोता रहता है,
बनकर मौन बवंडर।
हर वर्ष यूँ ही सावन आता
और चला जाता है,
सूनी डालों पर हरियाली का
गीत सुना जाता है।
पर जिस हृदय की ऋतु ही
शून्य में ठहर गई हो,
वहाँ सावन भी केवल मौसम
बनकर चला जाता है।
