बरसात की फुहारों के बीच खिड़की के पास खड़ी एक भारतीय महिला दूर क्षितिज की ओर निहार रही है। बाहर हरियाली और वर्षा है, लेकिन उसके चेहरे पर विरह, प्रतीक्षा और अनकही उदासी की गहरी छाप दिखाई देती है।

प्रतीक्षारत सावन

सावन केवल बारिश का मौसम नहीं, बल्कि स्मृतियों, प्रतीक्षा और अनकहे दर्द का भी नाम है। ‘प्रतीक्षारत सावन’ कविता उस मनःस्थिति को अभिव्यक्त करती है, जहाँ बाहर प्रकृति हरियाली से भर उठती है, लेकिन भीतर का आँगन अब भी किसी अपने की प्रतीक्षा में सूना रहता है।

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