“मन अमराई महकी रे”
सावन की बदली, भीगी पलकें, कोयल की कूक और मन में उतरती प्रेम की याद. ‘मन अमराई महकी रे’ रिश्तों, प्रकृति और प्रीत के मधुर एहसासों से सजी भावपूर्ण हिंदी कविता है.

सावन की बदली, भीगी पलकें, कोयल की कूक और मन में उतरती प्रेम की याद. ‘मन अमराई महकी रे’ रिश्तों, प्रकृति और प्रीत के मधुर एहसासों से सजी भावपूर्ण हिंदी कविता है.
हरियाली तीज सावन, प्रेम, सुहाग और विश्वास का पर्व है। प्रस्तुत कविता में मेहंदी, झूले, हरी चूड़ियों और शिव-पार्वती के माध्यम से प्रेम और समर्पण की सुंदर अभिव्यक्ति की गई है।
सावन केवल बारिश का मौसम नहीं, बल्कि प्रकृति के नवजीवन, प्रेम, उल्लास और बचपन की मीठी यादों का उत्सव है। प्रस्तुत कविता “रिमझिम-रिमझिम सावन बरसे” में वर्षा की पहली फुहार, मिट्टी की सौंधी महक, मोर-पपीहे का उल्लास, हरी चूड़ियों की खनक और कागज़ की नावों से जुड़े बचपन के अनमोल पल अत्यंत सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किए गए हैं।
सावन केवल बारिश का मौसम नहीं, बल्कि स्मृतियों, प्रतीक्षा और अनकहे दर्द का भी नाम है। ‘प्रतीक्षारत सावन’ कविता उस मनःस्थिति को अभिव्यक्त करती है, जहाँ बाहर प्रकृति हरियाली से भर उठती है, लेकिन भीतर का आँगन अब भी किसी अपने की प्रतीक्षा में सूना रहता है।
जब से हमारी नज़रें मिली हैं, दिल की दुनिया बदल सी गई है. इच्छाओं को जैसे नए पंख मिल गए हैं और हर ख्वाहिश अब तुम्हारी ओर ही उड़ती है. दिल की बातें दिल तक पहुंचने को तरस रही हैं, लेकिन सावन की बरसात हमारे मिलने में दूरी बनकर खड़ी है. हर बूंद में एक अजीब सी आग है, जो तुम्हारी याद और लगन को और गहरा कर देती है. मन में बस एक ही चाह है तुमसे मिलना, तुम्हारे करीब आना, और इस प्रेम को हर पल जीना.