कुर्सी

पापा की खाली लकड़ी की कुर्सी, जिस पर उनकी यादें आज भी जीवित हैं – भावुक हिंदी संस्मरण

सपना परिहार, बिरलाग्राम नागदा जं.

पूजा-पाठ से फ़ुर्सत होकर पापा हमेशा की तरह मम्मी को आवाज़ लगाते थे, “मेरा नाश्ता नीचे ऑफिस में पहुँचा देना।”

बचपन से पापा की यह दैनिक दिनचर्या देखकर मैं अक्सर सोचती थी कि पापा इतना काम करके रात को देर से घर आते हैं, फिर भी सुबह जल्दी उठकर अपनी दिनचर्या का एक भी हिस्सा कभी नहीं छोड़ते। शायद यही अनुशासन हम भाई-बहनों के जीवन में भी उतर गया था।

पापा के ऑफिस में रखी वह कुर्सी केवल एक फर्नीचर नहीं थी, बल्कि उनके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा थी। स्कूल से लौटने के बाद पापा सीधे उसी कुर्सी पर बैठ जाते। कई बार दिन का खाना भी ऑफिस में ही मँगा लेते और उसी कुर्सी पर बैठकर खा लेते। सुबह का अख़बार भी वे उसी पर बैठकर पढ़ते थे। शाम को दोस्तों के साथ भी ऑफिस में उसी कुर्सी पर बैठकर घंटों बातें किया करते थे।

मम्मी के जाने के बाद वह बहुत अकेले हो गए थे। इसलिए रिटायरमेंट के बाद अपना अधिकांश समय वे अपने ऑफिस में, उसी कुर्सी के साथ बिताते थे। कभी उदास होते, कभी मन हल्का करते। वहीं उनका खाना-पीना चलता और कभी-कभी दोस्तों के साथ छोटी-सी पार्टी भी हो जाती।

हमें आदत हो गई थी पापा को उसी कुर्सी पर बैठे हुए देखने की। घर में प्रवेश करते ही सबसे पहले पापा का ऑफिस आता था और उस ऑफिस में पापा अधिकतर उसी कुर्सी पर बैठे हुए मिलते थे। रात होने पर ही वे ऊपर अपने कमरे में आते, खाना खाते और सो जाते।

अब पापा नहीं हैं। उनकी वह कुर्सी आज एक कोने में निर्जीव-सी पड़ी हुई है। शायद इसलिए कि मैंने उसे हमेशा सजीव ही माना था। वह पापा की सबसे पसंदीदा कुर्सी थी और उस पर वे किसी को भी बैठने नहीं देते थे।

सच, एक इंसान के जाने के बाद कितना कुछ बदल जाता है। उसके साथ उसकी चीज़ें भी बहुत जल्दी बदल दी जाती हैं, उस स्थान से भी हटा दी जाती हैं, जो कभी उसकी पहचान हुआ करता था।

आज भी जब पापा याद आते हैं, तो हमेशा ऐसा लगता है कि वह सामने उसी कुर्सी पर बैठे हैं और अख़बार पढ़ रहे हैं—अपना पसंदीदा सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहने, आँखों पर चश्मा लगाए और चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान लिए।

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