इन्सानियत

विभाजित समाज और इंसानियत के संकट को दर्शाता भावनात्मक प्रतीकात्मक दृश्य।

‘अर्चना अश्क मिश्रा ‘

सच जानने की फुर्सत किसे है,
अफवाहों का शोर जारी है।

हम सब गूंगे-बहरे हुए,
इन्सानियत का मरना जारी है।

मानवता भी अब शर्मसार हुई,
खुद का ही घर फूँकना जारी है।

लहू भी अब जर्द हो चला,
खुद में खुद का मरना जारी है।

धर्म, कौम, मजहब का पता नहीं,
बस तमाशा देखना जारी है।

क्या सब कुछ लुटाकर ही चेतेंगे हम?
सभी का धृतराष्ट्र बनना जारी है।

हे कृष्ण! कहाँ हो तुम…?
महाभारत का युद्ध जारी है।।

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4 thoughts on “इन्सानियत

  1. बहुत ही उत्कृष्ट प्रस्तुति है आदरणीया 👌

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