(रिद्धिमा की आत्मकथा से)

निवेदन- यह कहानी रिद्धिमा नामक एक लड़की की आत्मकथा का एक हिस्सा है…
आप इस कहानी पर अपनी राय अवश्य दें.
सुरेश परिहार,पुणे
2011 का वह साल आज भी मेरी स्मृतियों में किसी पुराने गीत की तरह बजता है .धीमा, मीठा और भीतर कहीं गहराई तक उतर जाने वाला. घर में एक नई बहू आई थी. वह रिश्तेदार भी थी और उम्र में मुझसे छोटी भी. हमारा संयुक्त परिवार था, जहाँ रिश्ते केवल नामों से नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों और निभाव से पहचाने जाते थे.वह घर में नई थी. अनजान चेहरों, नए नियमों और अनकहे दबावों के बीच खड़ी एक संकोची लड़की. उसकी आँखों में मुझे एक अजीब-सी घबराहट दिखाई देती थी. शायद वही घबराहट, जो बरसों पहले कभी मेरी अपनी आँखों में भी ठहरी थी.
मैंने भी विवाह के बाद का संघर्ष देखा था. रिश्तों को समझते-समझते, खुद को खोते और खोजते हुए कई बार भीतर से टूट चुकी थी. उस समय मुझे थामने वाला कोई नहीं था. शायद इसी अधूरेपन ने मेरे भीतर यह जिद पैदा कर दी थी कि जो खालीपन मैंने जिया है, वह उसे न जीना पड़े.
उसकी इंगेजमेंट से ही मैंने उसे अपने मन में एक छोटी बहन और सच्ची दोस्त की जगह दे दी थी. मैंने मन ही मन एक रिश्ता बुन लिया था. ऐसा रिश्ता जिसमें औपचारिकता नहीं, अपनापन हो; जहाँ बातें छिपानी न पड़ें और आँसू समझाने न पड़ें. मैंने सोचा था.हम साथ बैठेंगे, रसोई में काम करते हुए हँसेंगे, रातों में देर तक बातें करेंगे और धीरे-धीरे एक-दूसरे की जिंदगी का जरूरी हिस्सा बन जाएंगे. रिश्ते जब दिल से बनते हैं, तब उनमें हिसाब नहीं होता सिर्फ भरोसा होता है. और मैंने यह रिश्ता पूरे भरोसे से अपनाया था. मैंने उसे घर के तौर-तरीके सिखाए. रोटी बनाने से लेकर साड़ी पहनने तक. किसे क्या पसंद है, कौन किस बात पर नाराज़ होता है, कौन-सा त्योहार कैसे मनाया जाता है. हर छोटी-बड़ी बात मैंने धैर्य और प्यार से समझाई.
उसके लिए बाज़ार जाना मुझे अच्छा लगता था. उसकी पसंद की चूड़ियाँ, कपड़े या खाने की चीजें देखकर अनायास ही मन मुस्कुरा उठता था. उसके लिए खाना बनाना, उसका आराम देखना और उसे किसी काम से बचा लेना.ये सब मेरे लिए जिम्मेदारियाँ नहीं, स्नेह के छोटे-छोटे उत्सव थे. सच कहूँ तो मैंने अपने ऊपर जितना खर्च नहीं किया, उससे कहीं ज़्यादा उसके लिए किया. लेकिन उस प्रेम में कोई सौदा नहीं था. मुझे बदले में उपहार नहीं चाहिए थे, बस इतना कि वह मुझे अपना समझे.
धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गहरी होने लगी. वह अपनी उलझनें मुझसे कहती और मैं अपने मन के बंद दरवाज़े उसके सामने खोल देती. कई बार वह हँसते हुए कहती
आप मेरी जिंदगी में एंजेल बनकर आई हैं. और मैं मुस्कराकर कहती-एहसान मत कहो यह तो अपना रिश्ता है. शायद मैं भावनाओं में थोड़ी ज़्यादा सच्ची थी. मैं उससे इस कदर जुड़ गई थी कि उसके बिना दिन अधूरा लगता था. उसका इंतजार, उसकी आवाज़ और उसकी छोटी-छोटी खुशियाँ सब मेरे अपने जीवन का हिस्सा बनने लगी थीं. मुझे यकीन था कि कुछ रिश्ते खून से नहीं, दिल से बनते हैं और शायद यह उन्हीं में से एक था. मैं सोचती थी, यह रिश्ता उम्रभर चलेगा. लेकिन जिंदगी का सबसे कठिन सच यही है. कुछ रिश्ते टूटने से पहले सबसे ज़्यादा खूबसूरत दिखाई देते हैं. वे भीतर ही भीतर दरक रहे होते हैं और हमें सिर्फ उनकी चमक दिखाई देती है.और उस समय मैं इस सच से बिल्कुल अनजान थी.
क्रमशः……
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इंतजार रहेगा अगले भाग का