संयुक्त परिवार में नई बहू और बड़ी महिला के बीच बनते अपनापन और भावनात्मक रिश्ते का दृश्य।

टूटता साथ

यह अध्याय रिद्धिमा की आत्मकथा का संवेदनशील हिस्सा है, जिसमें वह एक नई बहू के साथ बने अपनापन, विश्वास और भावनात्मक जुड़ाव को याद करती है। रिश्तों की खूबसूरती और उनके भीतर छिपी नाज़ुक सच्चाइयों का मार्मिक चित्रण इसमें उभरता है।

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जिसके सिर पर छांव नहीं थी… वो खुद सूरज बन गया”

फादर्स डे पर बच्चों ने मुझे बधाई दी, लेकिन मैं अपने पिता को कभी ‘हैप्पी फादर्स डे’ नहीं कह पाया। क्योंकि वो होते हुए भी कभी पिता जैसे नहीं रहे। ठोकरें लगीं, खुद ही संभला, खुद ही सीखा… शायद इसी में ज़िंदगी की असली सीख थी।”

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