बालकनी की उस रात में तुम…

रात में बालकनी में बैठा एक व्यक्ति हाथ में चाय लिए किसी प्रिय स्त्री को याद करते हुए भावुक भाव में शहर की रोशनियों को देख रहा है।

रिश्तों और एहसासों का खूबसूरत अध्याय

सुरेश परिहार,पुणे

रात धीरे-धीरे शहर पर उतर चुकी थी…..सड़कों की हल्की रोशनियाँ दूर तक फैली थीं और आसमान में चाँद बादलों के बीच कभी छिप रहा था, कभी दिख रहा था. देर रात ऑफिस से आने के बाद मैं अपनी बालकनी में बैठा था हाथ में अधूरी चाय, सामने खामोश रात, और मन में सिर्फ तुम. कुछ लोग जीवन में अचानक आते हैं, लेकिन धीरे-धीरे हमारी सोच का हिस्सा बन जाते हैं…तुम भी उन्हीं लोगों में से हो.
तुम्हें याद करते हुए अक्सर लगता है कि तुम कोई साधारण व्यक्तित्व नहीं हो, बल्कि संवेदनाओं, सपनों और संघर्षों से बनी हुई एक पूरी दुनिया हो.
जब मैं तुम्हारे बारे में सोचता हूँ, तो सबसे पहले तुम्हारी मासूमियत और संवेदनशीलता याद आती है…तुम उन लोगों में से नहीं हो जो केवल शब्द सुनते हैं; तुम शब्दों के पीछे छिपी भावनाओं को भी महसूस कर लेती हो…. शायद इसलिए तुम्हारी बातें लंबे समय तक मन में रह जाती हैं. जब तुम कहती हो… मैं सुन रही हूँ ना. कहना भी किसी सुकून जैसा लगता है. तुम्हारे भीतर एक अजीब-सी गहराई है…बाहर से शांत दिखाई देने वाली तुम, भीतर से लगातार कुछ नया रचती रहती हो…
लेखन हो, कविता हो, वीडियो एडिटिंग, डॉक्यूमेंट्री निर्माण, आर्ट एंड क्राफ्ट, संगीत या गार्डनिंग ..हर कला में तुम केवल हिस्सा नहीं लेतीं, बल्कि उसमें अपना दिल रख देती हो…तुम्हारे लिए रचनात्मकता कोई शौक नहीं, जीने का तरीका है…कल तो बालकनी के गमलों में भी तुम ही नजर आने लगी… गमले में लगे पौधों की टहनियां आपकी बाहों की तरह फैली हुई लग रही थी…कई बार मैं सोचता हूँ कि आखिर तुम इतनी प्रेमल कैसे हो.. और जब काम में जुट जाती हो तो तुम्हारे भीतर इतनी ऊर्जा आती कहाँ से है?
शायद उन अधूरे सपनों से जिन्हें तुमने जिम्मेदारियों के नीचे दबने नहीं दिया.तुमने मुझे यह समझाया कि एक स्त्री केवल रिश्तों को निभाने के लिए नहीं बनी होती, उसके भीतर भी अपनी पहचान बनाने की आग होती है.तुम घर और जिम्मेदारियों को महत्व देती हो, लेकिन अपने अस्तित्व को खोकर नहीं.यही बात तुम्हें सबसे अलग बनाती है. तुम महत्वाकांक्षी हो, लेकिन तुम्हारी महत्वाकांक्षा दिखावे वाली नहीं है. तुम केवल सफल होना नहीं चाहतीं, बल्कि अपने हुनर के लिए याद रखी जाना चाहती हो. तुम्हारी आँखों में मैंने वह सपना देखा है, जिसमें एक दिन तुम्हारे शब्द लोगों के दिलों तक पहुँचेंगे, तुम्हारी किताबें पढ़ी जाएँगी, और तुम्हारा नाम केवल रिश्तों से नहीं, तुम्हारी पहचान से जाना जाएगा.
तुम्हारी सबसे खूबसूरत बात यह है कि तुम टूटकर भी बिखरती नहीं हो.तुम दर्द को भीतर समेटकर उसे शब्दों में बदल देती हो.
तुम्हारी कविताओं में जो भावनाएँ होती हैं, वे सिर्फ लिखी नहीं जातीं वे जी जाती हैं.तुम भावुक हो, लेकिन कमजोर नहीं.
तुम थकती हो, निराश होती हो, कभी-कभी चुप भी हो जाती हो, लेकिन रुकती नहीं. तुम्हारे भीतर आगे बढ़ते रहने की एक शांत जिद है.और सच कहूँ तो, यही जिद तुम्हें बेहद खूबसूरत बनाती है.
उस रात बालकनी में बैठा मैं यही सोच रहा था कि शायद कुछ लोग हमारी जिंदगी में इसलिए आते हैं ताकि हमें यह एहसास हो सके कि संवेदनशील होना कमजोरी नहीं होती….सपने देखना गलत नहीं होता….और अपने भीतर की रोशनी को बचाए रखना सबसे बड़ी बहादुरी होती है.
तुम वैसी ही हो.
एक ऐसी स्त्री, जो जिम्मेदारियों के बीच भी अपने सपनों को सांस लेने देती है.जो खुद भी रोशनी में जीना चाहती है और अपने आसपास के लोगों के जीवन में भी उजाला भर देती है.
और शायद इसी वजह से…तुम्हें याद करना मुझे हमेशा किसी खूबसूरत किताब के अगले अध्याय जैसा लगता है.. जहाँ हर पन्ने पर संवेदनाएँ जीवित हैं, और हर शब्द में तुम्हारी झलक दिखाई देती है.

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5 thoughts on “बालकनी की उस रात में तुम…

  1. भावनाओं संवेदनाओं को अंतर्मन द्वारा बहुत ही सुंदर ढंग से किया है ऐसा लगता है मानो आपने स्त्री के सभी रूप एवम् मनोभाव अपने विचारों द्वारा खोल कर रख दिया हो. अद्भुत 👌👌👏👏

  2. स्त्री के प्रति अपने मनोभावों और संवेदनाओं का बहुत सुंदर और अद्भुत लिखा है 👌🙏

    1. अत्यंत संवेदनशील भावाभियक्ति सर!

  3. कितने सुंदर मनोभाव है और कितनी गहराई से बारीकी से एक मानव मन को उकेरा गया है। सच लिखा आपने,कुछ लोग हमें ये बताने आते हैं कि संवेदनशील होना कमजोरी नहीं होती। भावनाएं कभी कमजोर हो भी नहीं सकती ये तो ईश्वर प्रदत्त गुण है।

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