मौन का अपराध

आधुनिक समाज में गिरते मानवीय मूल्यों, सामाजिक विभाजन और नैतिक संकट को दर्शाता गंभीर और प्रतीकात्मक दृश्य।

मीनाक्षी पारिक, जयपुर

यह समय
जहाँ सत्य, अपने ही प्रतिध्वनि-कक्ष में
धीमे-धीमे क्षीण होता जा रहा है,
और असत्य
उत्सवों की रोशनी ओढ़कर
सार्वजनिक स्वीकृति का मुखौटा पहन चुका है।

यह वही वर्तमान है—
जहाँ स्वतंत्रता का अर्थ
कर्तव्यों से विमुख होकर
सुविधाओं की निर्लज्ज माँग में सिमट गया है;
जहाँ अधिकारों की उद्घोषणा
कर्तव्यबोध की चुप्पी को निगलती जाती है।

अनुभव के श्वेत केश—
अब दिशा नहीं, उपेक्षा का प्रतीक हैं;
और अधीर पीढ़ी—
ज्ञान के सार को त्यागकर
क्षणिक शोर को ही सत्य मान बैठी है।

संवाद—
जो कभी विचारों का सेतु था,
अब आरोपों की खाई बन चुका है;
शब्द—
जो मरहम हुआ करते थे,
अब शूल बनकर
मानवता की त्वचा को चीरते हैं।

विचारों की शतरंज पर
मानव नहीं, पहचानें चल रही हैं—
जाति के खाँचे, धर्म के रंग,
भाषा के विभाजन
और इन सबके बीच
मनुष्य, धीरे-धीरे
अपनी ही परिभाषा से वंचित होता जा रहा है।

लोभ ने
नवाचार का रूप धर लिया है,
और प्रलोभन
नीतियों का आधार बन बैठे हैं;
जहाँ परिश्रम की धीमी आँच को
मुफ्त के वादों की आँधी
बार-बार बुझा देती है।

यहाँ
आत्मनिर्भरता अब संघर्ष नहीं,
एक उपेक्षित आदर्श है;
और निर्भरता—
सुविधा के नए धर्म की तरह
स्थापित की जा रही है।

धरती
जो कभी श्रम की गंध से महकती थी,
अब भ्रम के उर्वरक से
विषाक्त फसलों को जन्म दे रही है;
खरपतवारों को संरक्षण मिलता है,
और सत्य
अप्रासंगिक घोषित कर
किनारों पर फेंक दिया जाता है।

धतूरे के फूल
विचारों में, व्यवस्थाओं में, संबंधों में
इतने सहज हो गए हैं
कि उनकी विषाक्तता
अब पहचान से बाहर हो चुकी है।

और विडम्बना यह
कि जो जड़ें
निःस्वार्थ भाव से इस भूमि को थामे हुए हैं,
जो राष्ट्र के प्रति
निष्ठा को कर्म में ढालते हैं—
उन्हीं पर संशय के बादल घिरते हैं,
उनकी आस्था को
प्रश्नों के कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

यह वर्तमान—
केवल समय का प्रवाह नहीं,
चेतना की परीक्षा है;
जहाँ हर मौन
एक सहमति बनता जा रहा है,
और हर उदासीनता
विष को विस्तार दे रही है।

यदि अब भी
विवेक जागृत न हुआ,
तो इतिहास
आरोपों की सूची नहीं बनाएगा,
वह केवल इतना लिखेगा
कि जब मूल्य विचलित थे,
तब मनुष्य मौन था।

इसलिए
आवश्यक है कि हम
फिर से मूल्यों की जड़ों तक उतरें,
विवेक के स्रोतों को पुनः जागृत करें,
और सत्य की तप्त धार से
इस विषाक्तता को परास्त करें।

क्योंकि
राष्ट्र केवल सीमाओं का विस्तार नहीं,
वह चेतना का संकल्प है;
और यदि यह चेतना
विष के साथ समझौता कर ले,
तो सभ्यता के इतिहास में
सबसे गहरी पराजय दर्ज होती है।

यह समय
विरोध का नहीं,
विवेकपूर्ण पुनर्निर्माण का है;
जहाँ शब्द नहीं,
संकल्प बोलें-
और मूल्य,
फिर से अपने शाश्वत स्थान पर प्रतिष्ठित हों।

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