मौन का अपराध
आधुनिक समाज में गिरते मूल्यों, बढ़ती विषाक्तता, संवादहीनता और विवेक के संकट पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है। साथ ही यह मूल्य आधारित पुनर्निर्माण और चेतना जागरण का आह्वान भी करता है।

आधुनिक समाज में गिरते मूल्यों, बढ़ती विषाक्तता, संवादहीनता और विवेक के संकट पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है। साथ ही यह मूल्य आधारित पुनर्निर्माण और चेतना जागरण का आह्वान भी करता है।
यह कविता ज्ञान को रूप, रस, शब्द, अनुभव और विवेक के समग्र स्वरूप में प्रस्तुत करती है। बालक के ‘क, ख, ग’ से लेकर विद्वान की विरासत तक ज्ञान को जीवन, संघर्ष, विनम्रता और सहानुभूति की निरंतर यात्रा के रूप में रेखांकित करती है।
कभी-कभी एक शब्द चुभ जाता है और दिल-दिमाग़ उलझ जाते हैं। लेकिन जब हम खुद को सामने वाले की जगह रखकर देखते हैं, तो समझ आता है कि क्रोध विवेक छीन लेता है और मन को भटका देता है। मानव बने रहने के लिए मन-मानस का तालमेल जरूरी है।