
गुरप्रीत कौर, बठिंडा
मुझे जितना जकड़ोगे,
मैं उतना ही फड़फड़ाऊँगी।
कैद करोगे अगर मुझे तो,
मैं पिंजरा तोड़ जाऊँगी।
किसी के भी द्वारा दी गई
बंदिशों से मैं रुकूँगी नहीं,
मैं अपनी उम्मीद हमेशा
कायम रखूँगी यहीं।
मैं पंछी की तरह
आसमान में उड़ान भरना चाहती हूँ।
अगर कोशिश की मेरे हौसले को डगमगाने की,
यह भ्रम है तुम्हारा कि मैं सहम जाऊँगी।
देखना, मैं तुम्हारी गुलामी के पिंजरे से
एक दिन आज़ाद हो जाऊँगी।
लड़की हूँ, तो क्या हुआ,
अपनों की रोक-टोक और समाज के तानों से
मैं अपनी ख्वाहिशें नहीं दबाऊँगी।
गुजारिश है मेरी मेरे अपनों से,
मुझे बेबाक होने दो,
मैं हमेशा अपनी हदों में रहूँगी,
मुझ पर भरोसा करो।
मैं कभी भी समाज के सामने
अपना सर नहीं झुकने दूँगी।
इल्तजा है मेरी आप सबसे,
मुझे सीमित रखने की कोशिश न करें,
क्योंकि मुझे जितना जकड़ोगे,
मैं उतना ही फड़फड़ाऊँगी।
कैद करोगे अगर मुझे तो,
मैं पिंजरा तोड़ जाऊँगी।
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बहुत सुंदर कविता ❤
जी धन्यवाद् 😊❤️
सुंदर👌👌