मायका

मायका नहीं होता सबका

डॉ. पांखुरी वक्त, उज्जैन

मायका सबका होता है,
पर सच में
नहीं होता सबका|
कभी तैरती आँखों में होता है,
यादों में होता है,
कभी केवल काश में होता है,
खाली पड़े आकाश में होता है|
अक्सर कहते सुना है
कलेजे में ठंडक तो
मायके पहुँचकर ही मिलती है,
पर उनको नहीं,
जिनका मायका नहीं होता|
उनके भीतर तो सदैव
चिता जलती रहती है,
जिसकी राख कभी
ठंडी नहीं पड़ती,
हमेशा सुलगती रहती है|
गर्मियों में वह आग और
प्रचंड हो उठती है,
झुलस-झुलस उठती है,
लेकिन उसके न होने की कसक
बनी रहती है ताउम्र
झुर्रियों वाले चेहरे में भी,
कमज़ोर होती नज़रों में भी,
झुकी हुई कमर में भी
पके हुए बालों में भी
बना रहता है इंतजार
कभी कोई संदेशा ही आ जाए
कुशलक्षेम ही पूछ ली जाए

लेखिका के बारे में

डॉ. पाँखुरी वक़्त
समकालीन हिंदी साहित्य की उन सशक्त रचनाकारों में हैं, जिनकी लेखनी संवेदना, चिंतन और सामाजिक सरोकारों का जीवंत दस्तावेज़ है। उज्जैन की सांस्कृतिक भूमि में जन्मी डॉ. पाँखुरी ने संस्कृत साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त कर न केवल अध्यापन के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई, बल्कि साहित्य, कला और अध्यात्म के विविध आयामों में भी उल्लेखनीय सक्रियता दर्ज की है।कवयित्री, कहानीकार, मंच संचालिका और वक्ता के रूप में उनकी बहुआयामी प्रतिभा देशभर के कवि सम्मेलनों, मुशायरों और प्रतिष्ठित आयोजनों में निरंतर प्रतिध्वनित होती रही है।
उनकी रचनाओं में जीवन के सूक्ष्म अनुभवों, नारी मन की गहन अनुभूतियों और समाज के बदलते परिदृश्य का सशक्त चित्रण मिलता है।आकाशवाणी से प्रसारित उनकी कविताएँ और वार्ताएँ, तथा रंगमंच पर उनके सशक्त अभिनय ने उन्हें एक संपूर्ण रचनाकार के रूप में स्थापित किया है।
वे आस्था समाज रचना सेवा अनुसंधान संस्थान और नीरजा नारी चेतना संस्थान की अध्यक्ष होने के साथ-साथ शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।उनका काव्य संग्रह ‘लम्हा-लम्हा जी लेते हैं’ तथा शोधपरक कृति ‘स्वतंत्रता समर के भूले-बिसरे सितारे’ उनकी रचनात्मक दृष्टि और गहन अध्ययन का प्रमाण हैं। डॉ. पाँखुरी वक़्त की रचनाएँ पाठक को केवल शब्दों का आनंद नहीं देतीं, बल्कि उसे भीतर तक छूकर एक नई सोच, नई संवेदना और जीवन को देखने का एक नया दृष्टिकोण भी प्रदान करती हैं।

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