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किस विध लूँ तेरी थाह

यह कविता एक गहरी, रहस्यपूर्ण और रूमानी अभिव्यक्ति है — प्रेम में डूबे एक हृदय की उस छटपटाहट और जिज्ञासा की, जो अपने प्रिय की भावनाओं, मौन संकेतों और अस्तित्व को पूरी तरह समझना चाहता है। शीर्ष पंक्ति “किस विध लूँ तेरी थाह प्रिय” पूरे काव्य का केंद्रीय भाव है — यह प्रश्न नहीं, एक आकुल जिज्ञासा है, एक समर्पण है।

कविता में प्रिय को एक ऐसी नदी के रूप में देखा गया है, जो सतह पर तो लहराती, मुस्कराती, बलखाती दिखती है, लेकिन भीतर कहीं गहराई में कई सदियों से प्यासेपन की पीड़ा को संजोए हुए है। वह प्रिय किसी दरिया से मिलन नहीं चाहता, फिर भी एक अनकहा प्रवाह है, जो उसे बहाए लिए जाता है — यही वह विरोधाभास है जिसे कवि समझना चाहता है।

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