
“मम्मी! मेरी ड्रेस कहाँ है?”
मैंने रसोई से ही चिल्लाकर कहा-
“अलमारी में होगी बेटा। देखो न ठीक से!”
“नहीं है! कल स्कूल में फैंसी ड्रेस है। मैंने आपको कितनी बार बोला था उसे ढूँढ़कर रखने!”
रोंदू-सी आवाज़ आई।
मैंने गैस धीमी की और कमरे में पहुँची तो आर्या ने पूरी अलमारी उलट-पुलट कर रखी थी।
“कौन-सी ड्रेस?”
“वही रानी वाली!”
“अरे वो तो पिछले साल की है।”
“तो क्या हुआ? इस बार भी मुझे रानी ही बनने कहा है मैम ने!”
मैंने ड्रेस निकालकर उसके सामने रख दी।
“ये अब छोटी हो गई है बेटा।”
वह उसे अपने सामने लगाकर देखने लगी। सच में, पिछले साल ठीक आने वाली ड्रेस इस साल घुटनों से काफी ऊपर थी।
“ओह! अब क्या करूँ मैं!”
“अब क्या! कोई दूसरी पहन लो।”
“मम्मी, मैम ने बोला है कि रानी बनकर ही आना है। सबके कपड़े बन गए हैं। मैं क्या पहनूँगी?”
उसका चेहरा उतर गया।
तभी मुझे सामने वाली गली के शेरा भाई याद आ गए। मुहल्ले के पुराने दर्जी!
मैंने कहा-
“शेरा भाई से पूछकर देखते हैं।”
आर्या ने तुरंत मुँह बनाया…
“वही पुराने अंकल?”
“हाँ।”
“उनकी दुकान पर मत जाना। वो इतने स्लो हैं! कितनी देर करते हैं साड़ी फ़ॉल-पिको करने में… और याद है लास्ट ईयर आपकी ब्लाउज उन्होंने पूजा के दिन ही दी थी। कितना परेशान हुए थे आप!”
“बेटा, पूजा पर्व में ज्यादा काम होता है न और फिर उनकी उम्र भी… खैर, अब क्या करूँ? आज शाम ही चाहिए तो ऑनलाइन मंगा लो न!”
मैंने मोबाइल उठाया और दो-चार ऐप खोल लिए।
रानी की पोशाक चाहिए थी, लेकिन या तो साइज नहीं था, या डिलीवरी दो दिन बाद की थी।
आर्या मेरे पास खड़ी होकर बोली-
“मम्मी, अब?”
मैंने फोन रख दिया।
“चलो शेरा भाई के पास।”
हम जल्दी ही पहुँच गए! गली के मोड़ पर एक छोटी-सी दुकान। बाहर दो-तीन कपड़े टंगे रहते, अंदर एक पुरानी सिलाई मशीन, दीवार पर रंग-बिरंगे धागों के डिब्बे और एक पुराना पंखा।
मैं कई सालों से उन्हें जानती थी।
हर बार दुकान के सामने से निकलते हुए वे पूछते-
“दीदी, कुछ सिलवाना हो तो बताइएगा।”
पर मैंने सालभर से कोई भी काम उनसे नहीं करवाया। आजकल सोशल मीडिया पर नए-नए डिज़ाइन देखकर उसे ही स्टिच कराने का फैशन चल पड़ा है… आज जब जरूरत पड़ी तो दुकान में घुसते हुए मुझे थोड़ी झेंप-सी हुई।
“शेरा भाई!”
उन्होंने मशीन रोककर चश्मा ऊपर किया।
“अरे दीदी! आइए।”
मैंने ड्रेस उनके सामने रख दी-
“ये ड्रेस आज शाम तक ठीक हो जाएगी?”
उन्होंने ड्रेस हाथ में लेकर देखा…
“किसके लिए है?”
“बेटी के लिए। कल स्कूल में फैंसी ड्रेस है।”
उन्होंने आर्या को दुलार से देखा…
“राजकुमारी बनोगी गुड़िया?”
आर्या ने बिना मुस्कुराए कहा-
“राजकुमारी नहीं, रानी!”
वे हँस पड़े…
“अच्छा! रानी साहिबा।”
उन्होंने ड्रेस उलट-पुलट कर देखी।
“कपड़ा कम पड़ेगा। किनारे पर ही सिलाई लगी है।”
मैंने माथा पकड़ लिया!
“तो अब?”
“घर में कोई लाल या सुनहरा कपड़ा है?”
“नहीं।”
“पुरानी साड़ी?”
मैं सोचने लगी… अचानक याद आया! एक पुरानी बनारसी साड़ी थी, जिसका पल्लू खराब हो गया था।
मैंने कहा-
“एक साड़ी है।”
“ले आइए दीदी… देखते हैं।”
आर्या ने धीरे से मेरे कान में कहा-
“मम्मी, इनसे हो जाएगा?”
मैंने उसे आँखों से चुप कराया और जल्दी से साड़ी लेकर लौटी।
शेरा भाई ने उसे उलट-पुलट कर देखा, फिर बोले-
“हो जाएगा।”
“कितने बजे?”
“छह बजे ले जाइएगा।”
मैंने घड़ी देखी।
दोपहर के डेढ़ बज रहे थे…
“इतनी जल्दी?”
उन्होंने मशीन पर धागा चढ़ाते हुए कहा…
“हाँ दीदी।”
मैंने पैसे पूछे।
“पहले काम देख लीजिएगा। मनमाफिक हो तो फिर बताऊँगा पैसे।”
“नहीं, बता दीजिए।”
“जो ठीक लगे दे दीजिएगा दीदी। बिटिया का काम है, बस समय से पूरा हो जाए।”
हम घर लौट आए।
शाम को छह बजे मैं ड्रेस लेने पहुँची तो दुकान बंद थी… साढ़े छह, सात, साढ़े सात… ओह!
मैंने फोन किया तो फोन बंद! मुझे गुस्सा आने लगा।
आर्या घर में परेशान घूम रही थी।
“मम्मी! मैंने बोला था न, इनसे मत करवाना। अब क्या होगा? छोड़ो, अब मैं स्कूल नहीं जाऊँगी कल।”
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
रात के करीब साढ़े आठ बजे दुकान का शटर उठा!
शेरा भाई अंदर से निकले! उनके हाथ में वही ड्रेस थी।
मैं लगभग उन पर बरस पड़ी।
“क्या है शेरा भाई! आपने फोन क्यों बंद कर रखा था? मैंने कितनी बार फोन किया!”
“माफ कीजिए दीदी। फोन की बैटरी खत्म हो गई थी।”
“कम से कम किसी के फोन से बता देते!”
उन्होंने बिना कोई जवाब दिए ड्रेस मेरी तरफ बढ़ा दी।
“देखिए पहले।”
मैंने ड्रेस खोली और कुछ देर उसे देखती रह गई…
वो वही पुरानी ड्रेस थी, लेकिन अब बिल्कुल नई लग रही थी। साड़ी के पल्लू से उन्होंने लंबी सुनहरी बॉर्डर निकालकर कमर पर लगा दी थी, छोटी हो चुकी स्कर्ट में नीचे नया कपड़ा जोड़ दिया था, कंधों पर छोटे-छोटे पफ बना दिए थे और पीछे ऐसा घेरा लगाया था कि आर्या सचमुच किसी कहानी की रानी लग रही थी!
आर्या ने ड्रेस हाथ में ली और खुशी से चिल्लाई-
“मम्मी! ये कितनी सुंदर है! ये आपने बनाया अंकल!”
“नहीं, मेरी दुकान में एक भूत रहता है मेरी मदद करने को!” उन्होंने हँसकर कहा।
आर्या खिलखिला पड़ी!
मेरी नजर उनकी उँगलियों पर गई।
एक उँगली में सुई चुभने का निशान था… काला-सा।
“इतनी देर क्यों लग गई?”
उन्होंने सहजता से कहा-
“कमर का नाप बदलना पड़ा था। बिटिया बढ़ गई है।”
मैंने आर्या की तरफ देखा। सच में! एक साल में वह कितनी बड़ी हो गई थी, मुझे पता ही नहीं चला था।
मैंने पैसे देने के लिए पर्स खोला।
“कितने हुए?”
“जो मन हो दे दीजिए दीदी!”
“अरे! ऐसे कैसे! कुछ तो बोलिए!”
मेरे लाख पूछने पर भी उन्होंने नहीं बताया। केवल इतना कहा-
“सिलाई के लिए दे दिया कीजिए दीदी और भी कपड़े! अपने मुहल्ले में काम मिलता रहता है तो घर चल जाता है। अब इस उम्र में कहीं और जाकर गुजारा करने का जी नहीं करता! पहले लगभग हर घर से काम मिलता रहता था, अब तो… इन बड़े बुटीक वालों ने हमारे पेट पर… दीदी, आप जो मुनासिब लगे दे दीजिए, हो सके तो बस ऐसे ही याद कर लिया कीजिए हम छोटी दुकान वालों को भी!”
मैंने उनके हाथ में पैसे थमाए और भारी मन से घर लौट आई…
सच ही तो कहा शेरा भाई ने… आधुनिक बनने की लालसा और घर बैठे शॉपिंग करने की ललक ऐसे कितने ही छोटे दुकानदारों के निवालों पर आफत बनकर टूटी है। अपने उन पड़ोसियों के लिए भी तो सोचना हमारा फ़र्ज़ है। ज्यादा न सही, पर थोड़ा तो काम दे ही सकते हैं उन्हें! इतनी जितने में सबकी रोजी-रोटी चलती रहे…
मैंने आर्या की तरफ देखा… लड़की ड्रेस पहनकर झूम रही थी… सुनहरी किनारी की चमक उसके चेहरे में घुल गई थी।
शेरा भाई! आज आपने एक पुरानी पोशाक ही नहीं, बढ़ाई मेरी सोच की चौड़ाई को भी बड़ा किया है।

थैंक यू सुरेश जी🌸🌸पोस्टर ❤️👌