
डॉ. रुपाली गर्ग मुंबई
अग्नि-सी आँखें, वज्र-सा संकल्प,
पर भीतर कहीं एक शांत सरोवर,
वो जो युद्ध में खड़ी दिखाई देती
असल में है ध्यान का ही समुंदर।
हाथ में शस्त्र, मन में मंत्र,
कदमों में धधकता आत्मविश्वास,
पर हर वार के पीछे छिपा हुआ
एक गहरा, मौन-सा विश्वास।
वो किसी से लड़ती नहीं,
वो खुद को पहचान रही है,
हर प्रहार में, हर हुंकार में
वो “मैं” को त्याग रही है।
महिषासुर बाहर नहीं बसता,
वो तो मन का अंधकार है,
और जो उसे हराने निकली
वो आत्मा का उजला विस्तार है।
जब क्रोध भी तप बन जाता है,
और शक्ति बनती है साधना,
तब नारी केवल देह नहीं
वो बन जाती है चेतना।
