
डाॅ. अनीता पंडा ‘अन्वी’ बैंगलुरू
इतने दिनों से कहाँ थे? आज अचानक सामने देख चौंका दिया प्रिय!”
“कैसे नहीं मिलता? तुम्हें मेरी ही तलाश थी। थी न?”
“हाँ थी। प्रिय! तुम्हें पहले सीने से लगा लूँ फिर चूम लूँ तो मुझे शान्ति मिलेगी। मेरे जीवन का सबसे सुखद पल हमने साँझा किया था,” कहते हुए प्रिया की आँखें नम हो आयीं।
“अरे! इसमें रोने की क्या बात है? अब तो तुम्हारी दुनिया बहुत विशाल हो गयी है। इसमें मेरी याद कैसे आयी?”
” कैसे न आती? प्रथम प्रकाशन की सूचना तुमने ही दिया था प्रिय! आज भी वह सुरक्षित है मेरे पास।”
“मैं सूचना के साथ तुम्हारी सफलता का प्रमाण पत्र भी हूँ। हूँ न?”
“हाँ, प्रिय! किन्तु ..”
“प्रिया! हौसला रखो। जब तक तुम चाहोगी, मैं साथ निभाऊँगा।”
“सही कहा मेरे प्रिय पोस्टकार्ड! वह पहला प्यार ही तो है, जो जीवन में प्रेम की रीढ़ बन जाता है। भूलना चाहो,तब भी नहीं भूलता।”
लेखिका के बारे में–
डाॅ. अनीता पंडा ‘अन्वी’
हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित लेखिका, शिक्षिका और शोधपरक चिंतक हैं। 1 जून, 1957 को वाराणसी में जन्मी ‘अन्वी’ ने हिंदी में एम.ए. (स्वर्ण पदक), बी.एड. एवं पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं।कहानी, कविता, लघुकथा, लोककथा और आलोचना जैसी विविध विधाओं में उनकी सशक्त लेखनी सक्रिय रही है। उनकी प्रमुख कृतियों में अनुत्तरित प्रश्न, सलीब पर औरत, उम्मीद ज़िन्दगी की, दो आब, लम्हें बोलते हैं तथा पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति पर आधारित कई शोधपरक पुस्तकें शामिल हैं।पूर्वोत्तर भारत के लोकजीवन, संस्कृति और परंपराओं को उन्होंने अपने लेखन में विशेष स्थान दिया है। उनकी रचनाएँ देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं तथा यूजीसी केयर जर्नल्स में प्रकाशित होती रही हैं। आकाशवाणी पूर्वोत्तर सेवा, शिलांग एवं दूरदर्शन मेघालय से उनकी रचनाओं का नियमित प्रसारण हुआ है।वे शिक्षिका के रूप में दीर्घकाल तक सेवाएँ देने के पश्चात वर्तमान में स्वतंत्र लेखन और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय हैं। उन्हें वर्ष 2015 में राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है। डाॅ. अनीता पंडा ‘अन्वी’ की लेखनी संवेदनशीलता, सामाजिक सरोकार और गहन शोध का सुंदर संगम है, जो उन्हें समकालीन हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।
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