कैक्टस

कैक्टस: एक स्त्री की पीड़ा, प्रेम और स्वाभिमान की मार्मिक कहानी

एक स्त्री की पीड़ा, प्रेम और स्वाभिमान की मार्मिक कहानी

डॉ. रत्ना मानिक, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

वो मुझसे उम्र में तकरीबन आठ नौ साल बड़ी थीं। किंतु एक जगह काम करते-करते हम एक दूसरे को इतनी अच्छी तरह से जानने समझने लगे थे कि आत्मीयता के सामने उमर की दीवार एक दिन अनजाने ही भरभरा कर गिर गई।मैं यानि मुदिता उन्हें अपनेपन से ‘दी’कहती किंतु उनसे अतिरिक्त दुलार के कारण शेष बातचीत में ‘तुम’ की ही अनौपचारिकता बरतती।

हमारे एक दूसरे के करीब आने की भी एक खास वजह थी…हमारे मन को जोड़ने वाला सेतु…एक दर्द का सेतु…जिसपर खामोशी से चलते हुए एक दिन हम एक दूसरे से टकरा गए।

 उनके मांझी के घाव इस कदर हरे थे कि अपनत्व का ज़रा सा हरका लगते ही भावनाएं रिसने लगतीं और उनकी नाक सुर्ख हो जाती थी। 

 हम एक दूसरे से बतियाते हुए अनजाने में अतीत की गलियों में भूल भुलैया के माफिक खो जाते। वहां घंटों भटकने के बाद किसी तरह से जब ख़ुद को वहां से निकालते तो सूजी आँखें और टूटे मन को वापस काम में झोंककर अपने दर्द की कच्ची सी तुरपाई कर देते।

जूही दी बावन तिरपन की उम्र में भी गजब की आकर्षक थीं। उनके व्यक्तित्व में सौम्यता और सौंदर्य का गजब नैसर्गिक मेल था । 

“ दी! तुमको गुस्सा नहीं आता था कि तुम्हारे इतने खूबसूरत और सलीकेदार होने पर भी, इतने रख-रखाव और रिश्तों को जतन से सहेजने,बच्चों और नौकरी की तमाम जिम्मेदारियों को बखूबी पूरा करने पर भी ‘वो’ तुमसे महीनों बात नहीं करते… तुम्हारी उपेक्षा करते …एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबियों की तरह पेश आते…?” एक दोपहर मैंने उनसे पूछ लिया था। 

उनकी भावहीन,निस्तेज आँखें कुछ देर तक मेरे चेहरे पर टिकी रहीं…” मुदी! उसका अहम उसके कद से भी बड़ा था और फिर उसके परिवार का एक संकुचित दमघोंटू वातावरण भी तो था…जहां औरतें दिन भर कोल्हू के बैल की तरह खटती रहती थीं, अपने सपनों को भट्ठी में झोंक कर संस्कारों की गठरी बनी रहती थीं…और देर रात गए गृहस्थी निपटा कर जब वे लहसुन प्याज और मसालों की गंध समेटे बिस्तर पर आतीं तो पति परमेश्वर की इच्छा पूर्ति भी घर के उन्हीं कामों का एक अहम हिस्सा होता जहां वो ज़रा भी ना-नुकूर करने की हिमाकत नहीं कर सकती थीं।

अजीब था उसका परिवार…वहां के मर्द एक घड़ी भी न अपनी बीवियों के संग बैठते, न कोई हंसी-मजाक,चुहल करते, न कभी अपना दुःख-सुख ही बतियाते । औरतों की गढ्ढों में धंसी पीली,निस्तेज आंखों में भविष्य का कोई धुंधला सा भी सपना आकार लेता न दिखाई देता। पुरुषों का रवैया बिल्कुल अजनबियों जैसा रहता पर वही मर्द निरभ्र आसमान में चांद जब पूरे निखार पर होता तो वे अपना पति होने का हक़ जताना न भूलते ।

“मूदी! मैं माइग्रेन से हर दूसरे तीसरे दिन कराहती,तड़पती रहती पर मजाल था कि वो कभी मेरा सिर सहलाकर ,मुझे दुलार कर,पुचकार कर मेरे दर्द को बांटने की कोशिश करता या मेरी तड़पन से उसकी आंखों में मुझे खोने का कोई खौफ़ दिखाई देता… ना…कभी नहीं…मैं उसके मुंह से प्यार के दो बोल सुनने के लिए तरस जाती…”वो अतीत के गहरे,खारे समंदर में उतरती जा रही थीं…और उनकी आँखें पलाश हुई जा रही थीं।

अगले सप्ताह कॉलेज के बच्चों के साथ मुझे एजुकेशनल टूर पर जाना था ।

जब लौटी तो पता चला कि ‘दी’ तीन सप्ताह से कॉलेज आई ही नहीं हैं ।मैं सीधे उनके घर पहुंच गई। लंबी बातचीत के साथ उन्होंने जो वचन मुझसे लेना चाहा उसे सुनकर मैं सकते में आ गई…क्या कहूं उनसे…कैसे उन्हें दिलासा दूं…सच को आख़िर झुठलाऊं भी तो कैसे…?उनका सच तो मेरे हाथों में मुंह बाए पसरा था…और ऊपर से उनकी अजीबो गरीब रट…। 

मैं उनके घर से रोते हुए वापस आई थी। चलते समय कागजों का जो पुलिंदा उन्होंने थमाया था वो अब भी मेरे सीने से लगा था। सारे कागजों को फैलाए मैं किसी दृष्टिहीन की तरह शब्दों पर अंगुलियां फिरा कर पढ़ने का प्रयास कर रही थी…और जूही दी की ठहरी-ठहरी सी आवाज कानों में गूंज रही थी -”मुदी! जब मेरी आंखों में मेरी ही पहचान खोने लगे…जब दर्द से कराहते हुए अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए मैं शब्दों को टटोलने लगूं और जुबान साथ न दे…जब मेरे अंगों की शिथिलता मेरे स्वाभिमान को आँखें तरेरने लगे तब…तब तुम मेरा ‘ये ‘ काम आसान कर देना। मैंने सारे जरूरी पेपर इस फाइल में रख दिए हैं…बस एक इच्छा थी… ‘उसकी’आंखों के रेगिस्तान में पीड़ा का चुभता हुआ कैक्टस देख सकूं…अकेलेपन का कैक्टस…प्रेम के प्रति उदासीनता का कैक्टस…

मेरी अंगुलियां उन कागजों के शब्दों को टटोल कर पढ़ रही थीं …ब्रेन ट्यूमर ग्रेड थ्री…

कानों में उनकी आवाज गूंज रही थी -”मुदी! मैं स्वाभिमान से मृत्यु का वरण करना चाहती हूं तुम इसे आसान बना देना…।”

बिस्तर पर फैले कागज बुरी तरह फड़फड़ा रहे थे…प्रेम में पीड़ा पाने वाली एक स्त्री की गुहार…इच्छा मृत्यु हेतु सरकार को गुहार…

डॉ. रत्ना मानिक
एक समर्पित शिक्षिका, संवेदनशील लेखिका और साहित्य की गहराइयों को समझने वाली विदुषी हैं। स्वतंत्रता सेनानी परिवार से जुड़ी उनकी जड़ें उन्हें संस्कार और संघर्ष की प्रेरणा देती हैं।लोयोला बी.एड. कॉलेज से शिक्षण प्रशिक्षण प्राप्त कर उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में मजबूत आधार बनाया। कोल्हान विश्वविद्यालय से पीएच.डी. कर उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी विद्वता को प्रमाणित किया। 2001 से हिंदी शिक्षिका के रूप में निरंतर विद्यार्थियों को ज्ञान और संस्कार प्रदान कर रही हैं। विभागाध्यक्ष और बोर्ड परीक्षाओं में हेड एग्जामिनर के रूप में उनकी जिम्मेदारी और दक्षता स्पष्ट झलकती है। लेखन की दुनिया में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाते हुए ‘आंखों के जुगनू’ जैसे कहानी संग्रह को प्रकाशित कराया। देशभर की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में उनकी रचनाएं नियमित प्रकाशित होती रही हैं। उनकी लेखनी में संवेदना, समाज और जीवन की सच्चाइयों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। डॉ. रत्ना मानिक शिक्षा और साहित्य दोनों क्षेत्रों में निरंतर प्रेरणा की एक उज्ज्वल मिसाल हैं।

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