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चाँदनी रात में डायरी पर लिखी प्रेम ग़ज़ल, पास में रखा फाउंटेन पेन और हल्की रोशनी

ग़ज़ल

“तिरी पलकों के साये में” एक भावपूर्ण हिंदी ग़ज़ल है जो प्रेम की नज़ाकत, रिश्तों की अहमियत, इल्म की रोशनी और माँ-बाप के अनकहे दर्द को बेहद संवेदनशील अंदाज़ में प्रस्तुत करती है। हर शेर जीवन की सच्चाई से रूबरू कराता है।

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सौतेले पिता को गले लगाती भावुक बेटी, पारिवारिक प्रेम का मार्मिक दृश्य

पापा

“पापा” एक ऐसी मार्मिक कहानी है जिसमें एक छोटी बच्ची अपने असली पिता के जाने के बाद सौतेले पिता को स्वीकार नहीं कर पाती। दर्द, तकरार और मासूम भावनाओं के बीच अंततः रिश्ते का सच्चा रूप सामने आता है।

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सर्द मौसम में घायल डिलीवरी बॉय टूटी घड़ी देखते हुए बाइक स्टार्ट करता हुआ, चेहरे पर थकी लेकिन व्यंग्यपूर्ण मुस्कान।

हंसी

सर्द हवा, फटा स्वेटर, तीन महीने की फीस और मां की दवाइयों के बीच जूझता एक डिलीवरी बॉय… हादसे के बाद भी समय पर डिलीवरी की चिंता। ‘हंसी’ एक ऐसी कहानी है जो संघर्ष की आग में तपते इंसान की विद्रूप मुस्कान को सामने लाती है।

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एक उदास महिला खिड़की के पास बैठी है, आंखों में आँसू, हाथ में पुरानी चिट्ठी, धुंधली रोशनी में प्रेम और विरह की भावना झलकती हुई।

इश्क़ की इंतहा

राँची, झारखंड की कवयित्री अर्पणा सिंह की यह मार्मिक ग़ज़ल प्रेम, विरह, तड़प और आत्मिक समर्पण की गहराइयों को उजागर करती है। “ज़िंदगी में तुम नहीं तो ज़िंदगी कुछ भी नहीं” पंक्ति के माध्यम से प्रेम की पूर्णता और विरह की पीड़ा का संवेदनशील चित्रण किया गया है।

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सड़क पर अपमानित खड़ी एक रोती हुई युवती, पृष्ठभूमि में धुंधला शहर और भावुक माहौल

मोहब्बत एक ज़हर

“मोहब्बत एक ज़हर” एक मार्मिक हिंदी कविता है, जो प्रेम में अपमान, सामाजिक भय, और माता-पिता के सम्मान के बोझ तले टूटती एक बेटी की पीड़ा को दर्शाती है। यह कविता युवा भावनाओं, पछतावे और परिवार की प्रतिष्ठा के संघर्ष को संवेदनशील शब्दों में अभिव्यक्त करती है।

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कविता, ग़ज़ल और एहसासों का उत्सव

मुंबई के गोरेगांव स्थित मृणालताई हॉल में चित्र नगरी संवाद मंच द्वारा साहित्य, संगीत और संवेदना से सजी एक मनभावन शाम आयोजित हुई। सकारात्मकता-नकारात्मकता पर रोचक चर्चा, कालजयी कविताओं का पाठ, ग़ज़लों की महक और पुस्तक विमोचन ने इस कार्यक्रम को खास बना दिया। साहित्यकारों, कलाकारों और श्रोताओं की दमदार मौजूदगी ने पूरे माहौल को जीवित और अर्थपूर्ण बनाया।

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मुंबई में झूमा शब्द-सागर

राष्ट्रीय कवि संगम, हिंदी साहित्य भारती महिला प्रकोष्ठ तथा विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार, 17 नवम्बर 2025 को मुंबई प्रेस क्लब, आज़ाद मैदान में “अभिव्यक्ति के स्वर” राष्ट्रीय बहुभाषी कवि सम्मेलन का भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ। विभिन्न भाषाओं में गूँजती काव्यात्मक अभिव्यक्ति और भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने इस साहित्यिक संध्या को अविस्मरणीय बना दिया।

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ईश्वर से ऊँचा स्थान तुम्हारा

ईश्वर से ऊँचा स्थान तुम्हारा, देते हो सबको सद्ज्ञान।किसी तरह का भेद न करते, तुम पर हमको अभिमान।। जो भी आया शरण तुम्हारी, उसको तुमने अपनाया।जड़-मूरख मन में भी, तुमने ज्ञान का दीप जलाया।सदा सिखाया बच्चों को करना आदर-सम्मान।ईश्वर से ऊँचा स्थान तुम्हारा, देते हो सबको सद्ज्ञान।किसी तरह का भेद न करते, तुम पर हमको…

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तेरी बिंदी

आज तुम्हारे भाल पर बिंदी बीचों-बीच सजनी चाहिए थी, पर तुमने उसे किनारे सरका दिया। यह कैसी गुस्ताख़ी? बस उसी को ठीक करने आया हूँ।”
उसने नंदिनी की बिंदी को मध्य में सजाया, और उसी क्षण उनकी साँसें थम-सी गईं।
रात को नंदिनी ने वही बिंदी आईने पर चिपकाते हुए धीमे से कहा—“अब यहाँ विराजिए निखिल जी… र हाँ, आँखें बंद रखना।”अगले दिन जब उसने निखिल का स्केच देखा, उस पर लिखा था—
“एक संपूर्ण रमणी नंदिनी।”

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आजन्म बिछोह

इस बार की यात्रा वैसी नहीं थी जैसी पहले हुआ करती थी। न तस्वीरें देखीं, न डायरी लिखी — मन एक अजीब उचाट, थका और शून्य में डूबा हुआ है। जूड़े के फूलों के बीच अब एक जोड़ी उदास आँखें महसूस होती हैं, जो स्मृतियों की तरह टंगी रह गई हैं। हर बार की तरह यह यात्रा आनंद नहीं, बल्कि एक सैलाब छोड़ गई — भावनाओं का, बिछोह का, और उस प्रेम का जो चुपचाप आता है और सब बहा ले जाता है। इस बार आषाढ़ केवल मौसम नहीं, एक डूबती आत्मा का रूप बन गया है। न प्रतीक्षा है, न वचन, न कोई सहारा — बस एक अंतहीन दूरी, जहाँ अगली मुलाकात की कोई संभावना नहीं। इस प्रेम की परिणति नहीं, केवल आजन्म बिछोह ही लिखा है।

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