“हाय… क्या हो रहा है…
यह कविता समाज के उस बदलते चेहरे को उजागर करती है जहाँ सच बोलने वाले खामोश कर दिए जाते हैं और मंचों पर समझौते बिकते हैं। यह कलम की ईमानदारी और दिखावे की दुनिया के बीच का तीखा टकराव है।

यह कविता समाज के उस बदलते चेहरे को उजागर करती है जहाँ सच बोलने वाले खामोश कर दिए जाते हैं और मंचों पर समझौते बिकते हैं। यह कलम की ईमानदारी और दिखावे की दुनिया के बीच का तीखा टकराव है।
यह कविता नारद जी और महंगाई के संवाद के माध्यम से समाज की विडंबना को उजागर करती है। महंगाई खुद को निर्दोष बताती है और असली जिम्मेदारी सत्ता और व्यवस्था पर डालती है जो इस व्यंग्य को और भी प्रभावशाली बनाता है।
यह कविता भगवान कृष्ण के अनेक दिव्य रूपों और लीलाओं का भावपूर्ण चित्रण करती है, जिसमें बाल्यकाल की नटखटता से लेकर धर्म और कर्म का उपदेश देने वाले सारथी रूप तक उनकी अनंत महिमा को दर्शाया गया है.
यह कविता रिश्तों, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों की गहराई को दर्शाती है, जिसमें बुज़ुर्गों का सम्मान, बेटियों की सुरक्षा और समाज के प्रति जिम्मेदारी का सुंदर संदेश दिया गया है।
राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच के तत्वावधान में आयोजित ऑनलाइन काव्य गोष्ठी में देशभर के कवि-कवयित्रियों ने अपनी उत्कृष्ट रचनाओं से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। गूगल मीट के माध्यम से हुए इस भव्य आयोजन में कविता, ग़ज़ल और नज़्म के जरिए प्रेम, समाज, नारी चेतना और देशभक्ति के विविध रंग देखने को मिले।
यह कविता एक स्त्री के भीतर के साहस को दर्शाती है, जो हर डर और दर्द से ऊपर उठकर केवल सच्चे प्रेम में समर्पित होना जानती है।
यह कविता सच्ची दोस्ती की गहराई को दर्शाती है, जहाँ एक दोस्त हर मुश्किल में साथ खड़ा रहता है और बिना कहे दिल की बात समझ लेता है।
यह कविता नारी के बाहरी साहस और भीतर की आध्यात्मिक शांति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है, जहाँ युद्ध बाहर नहीं बल्कि मन के अंधकार से होता है और हर प्रहार आत्मबोध की ओर एक कदम बन जाता है।
यह ग़ज़ल जीवन के बदलते नजरिए, रिश्तों के इशारों और समाज में छिपे मुखौटों को बेहद सधी हुई भाषा में उजागर करती है।
“ख़्वाब बुनती रात” एक संवेदनशील कविता है, जो रात के सन्नाटे में जन्म लेती भावनाओं, सपनों और कल्पनाओं को शब्दों में ढालती है। यह कविता दिल और ज़ेहन के बीच चल रहे अनकहे संवाद को बेहद खूबसूरती से प्रस्तुत करती है।