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खुद को निहारना भूल गई वो..

कविता महिलाओं के अक्सर अनदेखे संघर्षों को उजागर करती है, जो हर रस्म, हर बंधन और त्यौहार निभाती हैं, फिर भी खुद की खुशियों और अपनी देखभाल के लिए समय नहीं निकाल पातीं। सुबह की भागदौड़, बच्चों को तैयार करना, टिफ़िन बनाना और घर के काम निपटाना—इन सब में वह अक्सर अपने आप को आइने में देखना भूल जाती हैं। पति, सास-ससुर और परिवार की जिम्मेदारियों को संभालते हुए हर छोटी-बड़ी बात पर ध्यान देती हैं, पर अपने लिए समय नहीं निकाल पातीं। बिंदी, पायल, झुमके और पल्लू संवारना—सब पीछे रह जाता है। बीमार होने पर भी उन्हें ताने और कई मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह कविता महिलाओं की अद्भुत सहनशीलता, उनके कर्तव्यों के प्रति समर्पण और रोज़मर्रा के जीवन में किए जाने वाले भावनात्मक परिश्रम को दर्शाती है, जो अक्सर अनदेखा रह जाता है।

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मेरी माँ 

मेरी माँ घर से बाहर तो जाती हैं, लेकिन घर को घर पर छोड़ नहीं पातीं। उनकी गृहस्थी उनकी परछाई की तरह हमेशा उनके साथ रहती है। रसोई उनके लिए वह जगह है, जहाँ बच्चे जैसी मासूमियत और स्नेह बसता है। लोग कह सकते हैं कि वह सिर्फ एक गृहिणी हैं, पर मेरी माँ केवल गृहिणी नहीं, मेरी जीवनी हैं।
उन्होंने मुझे इतिहास, भूगोल और गणित की बारीकियाँ, साहस, सहिष्णुता और समग्र दृष्टि दी। लगभग सभी विषयों का ज्ञान और जागरूकता उन्होंने मुझे प्रदान की। इस पूरी प्रक्रिया में मेरे पिता भी मेरे और माँ के विकास में साथ रहे।

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वृद्धाश्रम में खिड़की के पास बैठी एक बुजुर्ग भारतीय माँ, हाथ में बेटे की फोटो, आंखों में इंतज़ार और दर्द

मस्‍त हवा का इक झौंका

यह कविता मां और बच्चों के प्रेम और यादों की भावनाओं को उजागर करती है। जीवन में अलगाव, पालन-पोषण और अंततः मातृत्व के अद्भुत बंधन को दर्शाती यह कविता भावनात्मक और मार्मिक है। प्रत्येक पंक्ति में माँ और बच्चे के बीच के गहरे प्यार और यादों का सौंदर्य दिखाई देता है।

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स्त्री है त्रिशक्ति

स्त्री वास्तव में त्रिशक्ति का प्रतीक है—वह शारदा की ज्ञानमयी छवि है, शिवा की त्याग और साहस भरी ऊर्जा है और श्री की समृद्धि और करुणा से भरपूर है। उसका स्वरूप कभी पीपल की ठंडी छाँव-सा शीतल है तो कभी सावन की झड़ी-सा तरल और जीवनदायी। ठिठुरती सर्दियों में वह गुनगुनी धूप बन जाती है। सृष्टि की शुरुआत भी उसी से होती है और अंत भी उसी में समाया हुआ है।

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नारी — जननी भी, शक्ति भी

नारी गहनों या दौलत की चाह नहीं रखती, उसे चाहिए सिर्फ़ सम्मान और बराबरी का हक़। वह माँ है, बहन है, बेटी है और पत्नी है—हर रूप में जीवन को सँवारती है। उसके भी अपने सपने हैं, अपनी इच्छाएँ हैं। लेकिन समाज अक्सर उसे कमज़ोर समझकर उसकी स्वतंत्रता छीनने की कोशिश करता है। सच्चाई यह है कि नारी कोमल ज़रूर है, पर निर्बल नहीं। वह कर्तव्यों का पालन करती है और प्रेम से जीती है। इसलिए ज़रूरी है कि हम उसकी भावनाओं और अस्तित्व का सम्मान करें।

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माँ के दो हाथों की टोकरी

माँ के दो हाथों की टोकरी में ज़िंदगी सिमटी रहती है। कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएँ हैं, बिल्कुल सटीक नहीं, लेकिन उनमें वही अपनापन है जैसे माँ की हथेलियाँ। वह टोकरी, जिसमें माँ एक जीवन को सम्भालकर रखती है, उसे पालती-पोसती है, दुलारती है। समय बीत गया, दुनिया बदली, मैं भी बहुत बदल गई, पर तेरे भीतर अब भी वही मासूमियत है—वही छोटे-से बच्चे की छवि, जो छोटी-छोटी गलतियाँ दोहराता है और माँ की हथेली पर सुरक्षित रहता है। लेकिन इस जंगल जैसी दुनिया में तुझे कैसे रखूँ? यही सोचकर दिल कांप जाता है। आ जा फिर मेरी हथेली में, छुप जा आंचल में, चैन से सो जा। इस भागदौड़ और छल-कपट को भूल जा, क्योंकि यह जीवन-जंगल कोई खेल नहीं। इसका अंत केवल एक “जंगल-आग” है।

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“यादों का लिफाफा”

इस कविता में एक संतान अपनी माँ की यादों और सीख को भावनात्मक रूप में संजोती है। माँ द्वारा दिए गए एक पुराने खत में छिपे भाव उसे आज भी संबल देते हैं। माँ की कही बातें, उसके एहसास, और उसका साथ — सब कुछ आज भी दिल की अलमारी में सजे हुए हैं। वह मानती है कि वह माँ जैसी नहीं बन सकी, लेकिन माँ से जीवन की सच्ची बातें सीखी हैं — मोहब्बत, यारी और कठिनाइयों में टूटे बिना जीना। उजालों की प्रतीक्षा में अंधेरों से जो उसने पाया, वो भी माँ की दी हुई रोशनी से ही संभव हो पाया।

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माँ जैसी नहीं हूं मैं…

यह कविता एक आत्मस्वीकृति है — एक बेटी की अपनी माँ के प्रति संवेदनाओं, निरीक्षणों और अनुभवों की गहराई से उपजी भावनाओं की अभिव्यक्ति। वह कहती है कि वह अपनी माँ की खामोशी पढ़ लिया करती थी, माँ के संघर्षों और त्याग की साक्षी रही है। माँ की आँखों में छिपे दर्द, जीवन की कठोर सच्चाइयों से संघर्ष, और अपनी इच्छाओं को निस्वार्थ भाव से दबा देने का दृश्य उसने बार-बार देखा।

वह माँ की हर वह चुप्पी पहचानती थी, जिसे दुनिया अनदेखा कर देती है। माँ के आँचल से आँसू पोछने से लेकर, चाँदनी रातों में अपने दुखों से बात करने तक की हर एक लम्हा, बेटी के मन में गहरे बैठ गया।

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सर्टिफिकेट

सिर्फ़ शादी होना सर्टिफिकेट नहीं होता, माँ!” — अनीता की ये बात एक सशक्त सामाजिक सवाल खड़ा करती है: क्या एक स्त्री की स्वतंत्रता और निर्णय का मापदंड सिर्फ विवाह होना चाहिए?

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जो टूटी नहीं.. वो राशि थी

राशि अब भी रोज़ लड़ती है—कभी खुद से, कभी हालातों से, और कभी रिश्तों की खामोश दीवारों से। पर अब उसकी लड़ाई किसी को मनाने की नहीं, खुद को साबित करने की भी नहीं… अब उसकी लड़ाई खुद को खोने से बचाने की है।

उस दिन जब वो मंच पर खड़ी थी, साड़ी के पल्लू में कॉर्पोरेट पहचान और आंखों में एक मां की नमी समेटे—तब शायद पहली बार उसने खुद को पूरा महसूस किया।

जिसने कभी सपने पूरे करने के लिए किसी का सहारा नहीं माँगा, आज वो अपने संघर्ष की इमारत में अपनी बेटी के लिए खिड़कियाँ बना रही थी—जहाँ से आर्या रोशनी देख सके, आज़ादी की हवा महसूस कर सके। राशि जान चुकी थी—”परफेक्ट” दिखना ज़रूरी नहीं, खुद को समझना, स्वीकारना और थामे रखना उससे कहीं ज़्यादा बड़ा काम होता है।

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