मौन का अपराध
आधुनिक समाज में गिरते मूल्यों, बढ़ती विषाक्तता, संवादहीनता और विवेक के संकट पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है। साथ ही यह मूल्य आधारित पुनर्निर्माण और चेतना जागरण का आह्वान भी करता है।

आधुनिक समाज में गिरते मूल्यों, बढ़ती विषाक्तता, संवादहीनता और विवेक के संकट पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है। साथ ही यह मूल्य आधारित पुनर्निर्माण और चेतना जागरण का आह्वान भी करता है।
स्वरा सुरेखा अग्रवाल (उत्तरप्रदेश) रिश्तों की डोर दोनों ओर से मजबूत होनी चाहिए। जितने ज़्यादा रिश्ते, उतनी डोर झुकेगी। रिश्तों की गति मद्धम होनी चाहिए, फास्ट नहीं, ज़रा स्लो रखिए। गर्माहट की तपिश स्निग्ध हो, पकड़ कोज़ी हो, चाशनी कम और कड़वाहट मनमोहक—यानी संतुलन ज़रूरी है। बांधिए भी उतना कि घुटन न हो, पकड़िए भी…
देहरादून की शांत वादियों से उठी एक आवाज़ आज समाज की सोच को चुनौती दे रही है. यह कहानी है लक्ष्मी कीभारत की पहली सर्टिफाइड दृष्टि दिव्यांग (विजुअली इम्पेयर्ड) रेडियो जॉकी, जिन्होंने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि समाज के स्थापित पूर्वाग्रहों को भी तोड़ने का साहस दिखाया.
जब हम आराम से घर में होते हैं, तब भी कोई हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए सड़कों पर होता है। यह लेख डिलीवरी बॉय के संघर्ष, मेहनत और समर्पण की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करता है।
महिदपुर रोड के बाजार में दुकानों के बाहर रखी एक साधारण कुर्सी कभी व्यापार की एक अनोखी परंपरा का प्रतीक हुआ करती थी। यह कुर्सी बताती थी कि दुकान की ‘बोनी’ हुई है या नहीं, और इसी के साथ जुड़ी थी आपसी समझ, अपनापन और बाजार की अनकही भाषा। आज भले ही समय बदल गया हो, लेकिन यह कुर्सी अब भी उन सुनहरी यादों को जीवित रखे हुए है।
यह लेख जीवन के विभिन्न पड़ावों बचपन, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था के माध्यम से बताता है कि हर उम्र अपने आप में खास होती है और हमें जीवन को समझने का एक नया दृष्टिकोण देती है।
मां का प्रेम निस्वार्थ और अटूट होता है। एक छोटी सी चिड़िया, जो तेज बारिश और तूफान में भी अपने अंडों की रक्षा के लिए अडिग खड़ी रही, हमें ममता का सच्चा अर्थ समझाती है। यह भावनात्मक अनुभव हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या इंसानों में भी ऐसा ही निष्काम प्रेम मौजूद है।
माएं कभी बूढ़ी नहीं होतीं, उनकी उम्र भले ही बढ़ जाए, लेकिन ममता हमेशा जवान रहती है. जिस मां ने अपना पूरा जीवन बच्चों की परवरिश में समर्पित कर दिया, वही मां एक समय ऐसा भी देखती है जब उसकी चिंता बच्चों को बोझ लगने लगती है. यह लेख उसी बदलते रिश्ते की सच्चाई और मां के त्याग को गहराई से महसूस कराने की एक संवेदनशील कोशिश है.
“वो जो छुट्टियां थीं” एक भावनात्मक और नॉस्टेल्जिक लेख है, जो हमें सीधे बचपन की उन सुनहरी यादों में ले जाता है, जहाँ नानी का घर हर खुशी का केंद्र हुआ करता था। यह रचना केवल छुट्टियों का वर्णन नहीं, बल्कि उस दौर की सादगी, अपनापन और पारिवारिक जुड़ाव की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करती है।
यह रचना उस क्षण की सच्चाई बयान करती है जब व्यक्ति दूसरों की अपेक्षाओं से बाहर निकलकर अपनी राह चुनता है। जैसे ही कोई अपने सपनों, अपनी आवाज़ और अपने आत्मसम्मान के लिए खड़ा होता है, वही समाज उसे चुभने वाला मानने लगता है। लेख जीवन की कमान अपने हाथ में रखने और स्वार्थी दुनिया की पहचान करने की सशक्त सीख देता है।