भावनात्मक कविता
कितनी अमायरा!
अखबारों की सुर्खियाँ कभी–कभार दहला देती हैं.जान देती बच्चियाँ, दबा दी जाती चीखें,और घोंघे सी रफ्तार से सरकतीं फाइलें। कुछ अमायरा साहस करती हैं, कुछ सहती हैं, कुछ ज़हर के घूंट पी जाती हैं…और कुछ अंतिम मुक्ति चुन लेती हैं।
बाल-दिवस पर याद आती है अमायरा. जिसकी मासूमियत दुनिया की क्रूरता से हार गई।
मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ… बस एक बार
रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर आज अमर और सुहानी ने एक क़ैफे में मिलने का तय किया था…अमर आज किसी कारण से सुहानी के शहर आया हुआ था.अमर और सुहानी पहली बार मिलने वाले थे…..अमर ने सुहानी से कई बार मिलने की रिक्वेस्ट की थी. शायद वैसे ही कह दिया करता था, क्योंकि वो भी…
दिया और कुम्हार
कविता उस कुम्हार की करुण कथा कहती है, जो मिट्टी के दिये बनाकर दुनिया के हर घर में उजाला फैलाता है, पर उसका अपना जीवन अंधकार में डूबा रहता है। वह दिन-रात मेहनत करता है ताकि अपनी बेटी की पढ़ाई, विवाह, माता-पिता की दवा और दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम कर सके। फिर भी लोग उसके परिश्रम की कीमत पर सौदा करते हैं, मानो एहसान कर रहे हों। त्योहार की चमक में उसकी मेहनत की सच्चाई गुम हो जाती है।
तेरी बिंदिया रे…..
जहां शायरों ने, कवियों ने, औरत की सुंदरता के लिए अनेकों उपमानों का प्रयोग किया है, जैसे झील सी गहरी आंखें, हिरण सी सुंदर आंखें, सुराही दार गर्दन, मोरनी सी चाल, वहीं एक प्रेमी, अपनी प्रेमिका की बिंदी पर मर मिटा है,और वह चाहता है कि चाहे वह और कोई श्रृंगार करें या ना करें ,सिर्फ एक छोटी सी बिंदी वह अपने माथे पर लगा ले, और उसे किसी भी उपमान की जरूरत नहीं होगी।
नीला आसमां
यह कविता एक शांत और भावपूर्ण नीले आसमां के माध्यम से मन की भावनाओं को व्यक्त करती है। मन पर लगे गहरे दाग और संताप, जैसे आसमां का नीला स्वरूप, आँखों के कोरों पर ढलते आँसुओं के साथ मिलकर भावनाओं को उजागर करता है। बिन मौसम की बारिश की तरह मन और आसमां दोनों के धुल जाने से अंततः शांति और स्वच्छता की अनुभूति होती है। यह कविता आंतरिक संताप और उसके समाधान की संवेदनशील यात्रा को दर्शाती है।
ढूँढें माँ की छाँव
यह कविता गहन भावनाओं और स्मृतियों के माध्यम से माँ और बचपन की छाया की खोज को प्रस्तुत करती है। पहली कविता में माता की ममता और उनके बिना घर की खाली-खाली देहरी की पीड़ा व्यक्त की गई है, जबकि दूसरी कविता में बचपन की नॉस्टैल्जिया और पिता की यादें उजागर हैं। कवि ने मातृत्व, प्रेम और संवेदनशीलता के रसों के साथ भावनाओं की गहराई में जाकर वियोग, याद और आत्मचिंतन का दृश्य खींचा है।
वो गाँव की कच्ची सड़क…
गाँव के बदलते स्वरूप और उसमें आने वाले शहरीकरण की भावनात्मक तस्वीर पेश करती है। कच्ची सड़कें अब काली, चौड़ी और बदल चुकी हैं, दोनों तरफ हरियाली से लहलहाते खेत अब दुकानों और व्यावसायिक स्थलों में बदल गए हैं। गाँव के लोग और उनकी सरल जीवनशैली धीरे-धीरे शहरी अंदाज़ और मुखौटे में बदल रही है। सुनार की जगह ज्वैलर्स, भड़भूजे और चने की जगह पॉपकॉर्न जैसी चीजें गाँव में जगह लेने लगी हैं। जबकि यह विकास और सुविधा का प्रतीक है, कवि अपने पुराने प्यार और ग्रामीण सादगी को याद करता है और मन में कचोट अनुभव करता है।
हिन्दी से है पहचान
सुमन दीक्षित, प्रसिद्ध लेखिका, कोलकाता अभिव्यक्ति किसी भी जीव की,ख़ासकर मानवीय संवेदनाओं का,सशक्त माध्यम परिलक्षित होती है—वह हो चाहे किसी भी रूप में…! अगर भाषा की बात आती,तो सम्मान हर भाषा का है;पर हिन्दी तो मेरे लिए जैसेईश्वर का एक वरदान है…! हिन्दी से है पहचान, क्षमता,गौरव भरा होता सदा सृजन।हिन्दी से जुड़ी है आत्मा…
हिन्दी से है मेरी पहचान
यह कविता हिंदी भाषा के प्रति प्रेम और गर्व को उजागर करती है। हिंदी केवल हमारी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, ज्ञान और संस्कारों का प्रतीक भी है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि हिंदी हमारे जीवन, साहित्य और राष्ट्र की आत्मा का अभिन्न हिस्सा है।
