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प्रिय, आना कभी काशी तुम

वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर उगते सूरज, माँ गंगा की आरती, बाबा विश्वनाथ मंदिर और आध्यात्मिक वातावरण को दर्शाती भावपूर्ण हिंदी कविता का प्रतीकात्मक दृश्य।

अनामिका सिन्हा पाठक ‘अर्श ‘ वाराणसी

प्रिय, आना कभी काशी तुम…
मिलूँगी तुमसे मैं सुबहे बनारस की तरह।

बैठेंगे हम माँ गंगा के घाटों पर…
महसूस करेंगे शिव के प्रति गंगा का दिव्य प्रेम, प्रेम की मर्यादा, प्रेम की शालीनता।

काशी विश्वनाथ मंदिर के शोर, गुल और जयकारों के बीच…
ध्यानस्थ आदियोगी महादेव के मौन में डूबेंगे साथ-साथ।

प्रिय, आना कभी काशी तुम…
मिलूँगी तुमसे मैं सुबहे बनारस की तरह।

शिव की नगरी वाराणसी में स्वयं माँ अन्नपूर्णा हाथ में सोने की कलछी और रत्नजड़ित चावल का पात्र लिए मानव की क्षुधा ही नहीं, आत्मा भी तृप्त करती हैं।
काशी में कोई भूखा नहीं रहता। शिव-शक्ति यहाँ विराजमान हैं।
माँ अन्नपूर्णा की रसोई में जिमेंगे हम साथ-साथ।

प्रिय, आना कभी काशी तुम…
मिलूँगी तुमसे मैं सुबहे बनारस की तरह।

अलमस्त, अति प्राचीन मंदिरों के इस शहर में पंडों, पुजारियों, पंडितों, गुरुओं, कला-साधकों, साहित्य-साधकों, आध्यात्मिक साधकों और ज्ञानियों की भरमार है।
वेशभूषा से भ्रमित मत हो जाना।
धूल में लिपटे बहुमूल्य फूल मिलेंगे यहाँ।
मिलेंगे साथ-साथ हम शिवत्व के प्रत्यक्ष प्रमाण परमयोगियों और अघोरियों से।
उनकी दिव्य ऊर्जा से आलोकित करेंगे अपना आध्यात्मिक मार्ग।

प्रिय, आना कभी काशी तुम…
मिलूँगी तुमसे मैं सुबहे बनारस की तरह।

दशाश्वमेध घाट पर गंगा-जल से शुद्ध करेंगे अपना तन, और घाट पर गूँजती वैदिक ऋचाओं, मंत्रोच्चार, हवन और होम से शुद्ध होगा हमारा अंतःकरण।
फिर बैठेंगे हम मणिकर्णिका घाट पर, जहाँ भस्मीभूत होगा हमारा अहंकार और पवित्र होगी हमारी आत्मा, जिसमें होगा शिवत्व का वास।
देखेंगे हम मृत्यु का उत्सव, करेंगे हम महाकाल का साक्षात्कार।

प्रिय, आना कभी काशी तुम…
मिलूँगी तुमसे मैं सुबहे बनारस की तरह।

काल भैरव का है काशी पर पहरा।
सारनाथ में विराजमान हैं गौतम बुद्ध, अपने प्रथम उपदेश की स्मृतियों के साथ।
माँ अन्नपूर्णा की रसोई यहाँ…
मोक्षदायिनी माँ गंगा का अनुराग यहाँ…
काशी के राजा हैं महादेव, हर घर में उनका साम्राज्य है।

देव दीपावली में देखना तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं को, मानो स्वर्ग सहित काशी में विराजमान हों।
किस विधि करूँ मैं शिव की काशी का गुणगान? अल्प है मेरा ज्ञान। सीमित शब्द-भंडार से कैसे करूँ निराकार को साकार?

मन वृंदावन, मन शिवाला हो, तभी जागृत होता है आनंदवन का ओंकार।
आओ, हम अपने स्नेहिल आँसुओं से शिव-शक्ति को रिझाएँ।
“नमः पार्वतीपतये, हर-हर महादेव” के उद्घोष से आदियोगी को जगाएँ।

प्रिय, आना कभी काशी तुम…
मिलूँगी तुमसे मैं सुबहे बनारस की तरह।

One thought on “प्रिय, आना कभी काशी तुम

  1. सादर आत्मीय धन्यवाद हृदय तल से Live Wire News के संपादक आदरणीय श्री सुरेश परिहार जी का बेहद खूबसूरती से मेरी रचना ‘ प्रिय आना कभी काशी तुम ‘ को प्रकाशित करने के लिए 🙏🥰🌷।

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