प्रिय, आना कभी काशी तुम
“प्रिय, आना कभी काशी तुम” प्रेम, भक्ति और अध्यात्म का अद्भुत संगम है। यह रचना पाठक को सुबहे बनारस, बाबा विश्वनाथ, माँ गंगा, अन्नपूर्णा, दशाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका और सारनाथ की आध्यात्मिक यात्रा पर ले जाती है, जहाँ प्रेम शिवत्व में विलीन हो जाता है।
