
रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
बारिश हमेशा से प्रेम की सबसे पुरानी साथी रही है। जब आसमान से गिरती बूंदें धरती को छूती हैं, तो लगता है जैसे प्रकृति स्वयं कोई प्रेमगीत गुनगुना रही हो। लेकिन उस शाम की बारिश कुछ अलग थी, क्योंकि उस दिन सिर्फ मौसम नहीं भीग रहा था, दो दिल भी प्रेम में भीग रहे थे।
शहर की भीड़भाड़ वाली सड़क पर लोग बारिश से बचने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। कोई दुकान की छत के नीचे खड़ा था, तो कोई पेड़ की ओट ढूँढ़ रहा था। लेकिन उन सबके बीच एक लाल छाता था, जो दूर से ही अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा था।
उस लाल छाते के नीचे आरव और अन्वी साथ चल रहे थे।
छाता छोटा था और रास्ता लंबा। इसलिए उनके कंधे बार-बार एक-दूसरे से छू जाते थे। बारिश की कुछ जिद्दी बूंदें छाते के किनारों से फिसलकर उनके चेहरों तक पहुँच ही जाती थीं। लेकिन उन्हें उस बारिश से शिकायत नहीं थी। शायद इसलिए कि उस दिन प्रेम, बारिश से भी ज़्यादा बरस रहा था।
अन्वी ने धीरे से आरव की ओर देखा। उसकी आँखों में वही अपनापन था, जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। जैसे वह उसे पहली बार नहीं, सदियों से जानती हो। जैसे उनके बीच की पहचान इस जन्म की नहीं, कई जन्मों की हो।
आरव मुस्कुराया।
उस मुस्कान में कोई बनावट नहीं थी। वह वैसी ही सच्ची थी जैसे पहली बारिश की खुशबू, जैसे मंदिर की घंटियों की ध्वनि, जैसे माँ की दुआ।
उस क्षण दोनों कुछ नहीं बोले। लेकिन कभी-कभी प्रेम को शब्दों की आवश्यकता नहीं होती। कुछ रिश्ते आँखों की भाषा में लिखे जाते हैं और दिल की धड़कनों में पढ़े जाते हैं।
बारिश तेज़ होती जा रही थी।
लाल छाते के नीचे दोनों और करीब आ गए। दुनिया जैसे धीरे-धीरे धुंधली पड़ गई। सड़कें, लोग, गाड़ियाँ—सब कहीं पीछे छूट गए। बचा था तो सिर्फ वह छोटा-सा संसार, जिसमें दो धड़कनें एक ही लय में चल रही थीं।
अन्वी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
आरव ने बिना कुछ कहे उसे थाम लिया।
वह स्पर्श साधारण नहीं था। उसमें विश्वास था, अपनापन था और वह अनकहा वादा था, जो प्रेमी अक्सर शब्दों में नहीं, एहसासों में करते हैं। दोनों को लगा मानो उनकी आत्माएँ बहुत पहले ही एक-दूसरे को पहचान चुकी थीं और आज बस औपचारिक रूप से मिल रही थीं।
उस पल समय भी जैसे ठहर गया।
बारिश की हर बूंद उन्हें आशीर्वाद-सी लग रही थी। मानो आसमान स्वयं उनके मिलन का साक्षी बनकर मुस्कुरा रहा हो। लाल छाता अब सिर्फ बारिश से बचाने वाला छाता नहीं रहा था। वह उनके प्रेम का छोटा-सा आशियाना बन चुका था।
वर्षों बाद भी शायद उन्हें उस दिन की सारी बातें याद न रहें। लेकिन वह लाल छाता याद रहेगा। वह बारिश याद रहेगी। वह हाथों का स्पर्श याद रहेगा। और याद रहेगा वह एहसास कि किसी भी भीड़भरी दुनिया में उन्होंने अपना घर एक-दूसरे के दिलों में खोज लिया था।
क्योंकि सच्चा प्रेम वहीं होता है, जहाँ दो लोग एक-दूसरे को देखकर यह महसूस करें कि उनका रिश्ता आज का नहीं, जन्मों-जन्मों का है। और फिर एक लाल छाते के नीचे खड़े होकर वे पूरी दुनिया को भूल जाएँ।

बहुत सुंदर सृजन 👌
वह लाल छाता हमेशा याद रहेगा