जब तुम आओ…
जब कोई मिलने आए, तो वह अधूरा नहीं, पूरा होकर आए—यही इस कविता का मूल भाव है। यह रचना बताती है कि आधे मन और बंटी हुई भावनाओं के साथ सच्चा समर्पण संभव नहीं होता। प्रेम तभी पूर्ण होता है, जब उसमें किसी प्रकार की कमी या विभाजन न हो।
खामोशी बोलती है
खामोशी एक ऐसी भाषा है जो बिना शब्दों के भी दिल की हर भावना को बयां कर देती है। यह कविता जीवन के हर पड़ाव को मौन के माध्यम से व्यक्त करती है।
आँखों की ख़ामोशी
इन आँखों की ख़ामोशी में एक दबी हुई रागिनी है अनकहे शब्दों की, आधी छूटी कहानियों की। चेहरे पर ठहरी शांति और निगाहों में उठते-गिरते समंदर के बीच एक गहरा मंथन छुपा है। ये आँखें जैसे हर सवाल का जवाब अपने भीतर समेटे बैठी हों, मानो कह रही हों कि उन्होंने बहुत कुछ देखा है… पर कहने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है।
सुनो बुद्ध…
यह कविता यशोधरा के दृष्टिकोण से बुद्ध के संन्यास पर प्रश्न उठाती है। प्रेम, कर्तव्य, गृहस्थ जीवन और आत्मकल्याण के बीच के द्वंद्व को संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है।
बूंदों के नूपुर
अम्बर चमके दामिनी, रिमझिम पड़े फुहार, सोंधी माटी की महक से भीगता देहात, सावन की झूले झूलती सखियाँ, बादलों संग गूंजता बूंदों का संगीत — यह कविता मानसून के सौंदर्य, ग्रामीण जीवन के उल्लास और प्रकृति की रूमानी छवि को भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है।
गणित और जिंदगी
यह कविता गणित के प्रतीकों—जोड़, घटाव, शून्य और अनंत—के माध्यम से जीवन, रिश्तों और दृष्टिकोण की जटिलताओं को संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है।
ऐतिहासिक दीवार
मैं एक पुरानी दीवार हूँ बोलने में असमर्थ, फिर भी सबके दुःख-दर्द, गुस्से और उपेक्षा की साक्षी| लोग अपने विषाद, हँसी, और थकान को मुझ पर टांग जाते हैं जैसे कोई पोस्टर दीवार पर चिपकाता है| जब वे मेरी पीठ से सिर टिकाकर बैठते हैं, मैं उन्हें मौन सहारा देती हूँ्| फिर भी, बदले में मुझे गालियॉं और अपमान मिलता है जैसे कोई पान की पीक थूक देता हो| मैं पुरानी जरूर हूँ, टूटने की कगार पर भी, लेकिन मेरे भीतर इतिहास छिपा है मैं ऐतिहासिक हूँ्
घर छोटे हुए, लेकिन संस्थाएँ बड़ी क्यों?
आज के समय में संयुक्त परिवार तेजी से बिखर रहे हैं और लोग अलग-अलग रहना पसंद कर रहे हैं। नौकरी, शहर बदलना या बड़े परिवार की मजबूरी जैसी वजहें तो सामान्य हैं, लेकिन सबसे गंभीर बात यह है कि एक ही घर में रहते हुए भी लोग अपने-अपने चूल्हे अलग कर लेते हैं। दूसरी ओर, महिलाएँ समाज में नई-नई संस्थाएँ सफलतापूर्वक चला रही हैं, फिर सवाल उठता है—जब महिलाएँ बड़े संगठन संभाल सकती हैं तो परिवार को क्यों नहीं जोड़े रख पा रहीं?
