Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers
एक आत्मविश्वासी युवती सूर्योदय के समय छत पर खड़ी है, उसके पास टूटा हुआ पिंजरा पड़ा है और आसमान में उड़ते पक्षी आज़ादी और सपनों की उड़ान का प्रतीक हैं।

उड़ान

‘उड़ान’ एक प्रेरणादायक हिंदी कविता है, जो लड़कियों के आत्मसम्मान, स्वतंत्र सोच और सपनों को पंख देने की बात करती है। यह कविता समाज की बंदिशों के विरुद्ध हौसले और विश्वास का संदेश देती है।

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एक भावुक जोड़ा, अधूरी मुलाकात का प्रतीक, शांत वातावरण में खड़ा हुआ

जब तुम आओ…

जब कोई मिलने आए, तो वह अधूरा नहीं, पूरा होकर आए—यही इस कविता का मूल भाव है। यह रचना बताती है कि आधे मन और बंटी हुई भावनाओं के साथ सच्चा समर्पण संभव नहीं होता। प्रेम तभी पूर्ण होता है, जब उसमें किसी प्रकार की कमी या विभाजन न हो।

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आँखों की ख़ामोशी

इन आँखों की ख़ामोशी में एक दबी हुई रागिनी है अनकहे शब्दों की, आधी छूटी कहानियों की। चेहरे पर ठहरी शांति और निगाहों में उठते-गिरते समंदर के बीच एक गहरा मंथन छुपा है। ये आँखें जैसे हर सवाल का जवाब अपने भीतर समेटे बैठी हों, मानो कह रही हों कि उन्होंने बहुत कुछ देखा है… पर कहने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है।

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यशोधरा आधी रात के शांत राजमहल में अपनी गोद में शिशु राहुल को लिए खड़ी हैं। उनकी आँखों में गहरा दर्द, अकेलापन और आत्मसम्मान झलक रहा है। खिड़की से आती चांदनी उनके चेहरे को प्रकाशित कर रही है, जबकि पृष्ठभूमि में खुला द्वार सिद्धार्थ के प्रस्थान का प्रतीक है। दृश्य त्याग, विरह, मातृत्व और आंतरिक शक्ति की मार्मिक अनुभूति कराता है।

सुनो बुद्ध…

यह कविता यशोधरा के दृष्टिकोण से बुद्ध के संन्यास पर प्रश्न उठाती है। प्रेम, कर्तव्य, गृहस्थ जीवन और आत्मकल्याण के बीच के द्वंद्व को संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है।

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बूंदों के नूपुर

अम्बर चमके दामिनी, रिमझिम पड़े फुहार, सोंधी माटी की महक से भीगता देहात, सावन की झूले झूलती सखियाँ, बादलों संग गूंजता बूंदों का संगीत — यह कविता मानसून के सौंदर्य, ग्रामीण जीवन के उल्लास और प्रकृति की रूमानी छवि को भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है।

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चाँदनी रात में डायरी पर लिखी प्रेम ग़ज़ल, पास में रखा फाउंटेन पेन और हल्की रोशनी

ग़ज़ल

“तिरी पलकों के साये में” एक भावपूर्ण हिंदी ग़ज़ल है जो प्रेम की नज़ाकत, रिश्तों की अहमियत, इल्म की रोशनी और माँ-बाप के अनकहे दर्द को बेहद संवेदनशील अंदाज़ में प्रस्तुत करती है। हर शेर जीवन की सच्चाई से रूबरू कराता है।

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मैं एक दीवार हूँ: मौन सहारा, दर्द और इतिहास की संवेदनशील कविता

ऐतिहासिक दीवार

मैं एक पुरानी दीवार हूँ बोलने में असमर्थ, फिर भी सबके दुःख-दर्द, गुस्से और उपेक्षा की साक्षी| लोग अपने विषाद, हँसी, और थकान को मुझ पर टांग जाते हैं जैसे कोई पोस्टर दीवार पर चिपकाता है| जब वे मेरी पीठ से सिर टिकाकर बैठते हैं, मैं उन्हें मौन सहारा देती हूँ्| फिर भी, बदले में मुझे गालियॉं और अपमान मिलता है जैसे कोई पान की पीक थूक देता हो| मैं पुरानी जरूर हूँ, टूटने की कगार पर भी, लेकिन मेरे भीतर इतिहास छिपा है मैं ऐतिहासिक हूँ्

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घर छोटे हुए, लेकिन संस्थाएँ बड़ी क्यों?

आज के समय में संयुक्त परिवार तेजी से बिखर रहे हैं और लोग अलग-अलग रहना पसंद कर रहे हैं। नौकरी, शहर बदलना या बड़े परिवार की मजबूरी जैसी वजहें तो सामान्य हैं, लेकिन सबसे गंभीर बात यह है कि एक ही घर में रहते हुए भी लोग अपने-अपने चूल्हे अलग कर लेते हैं। दूसरी ओर, महिलाएँ समाज में नई-नई संस्थाएँ सफलतापूर्वक चला रही हैं, फिर सवाल उठता है—जब महिलाएँ बड़े संगठन संभाल सकती हैं तो परिवार को क्यों नहीं जोड़े रख पा रहीं?

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