प्रेम का वादा, पीड़ा का सच

नारी का हृदय प्रेम में जितना कोमल होता है, पीड़ा में उतना ही कठोर अनुभवों से गुजरता है। प्रेम से पीड़ा तक का यह सफ़र उसकी संवेदनाओं को भीतर तक झकझोर देता है। धोखा, अपमान और परित्याग उसके आत्म-सम्मान को धज्जी-धज्जी कर देते हैं, कभी-कभी तो उसे जीवन-लीला समाप्त करने की कगार पर पहुँचा देते हैं।

फिर भी वही नारी आँसुओं में भी शक्ति ढूँढ़ लेती है। टूटकर भी वह बिखरती नहीं, बल्कि खुद को गढ़ लेती है—अपनी प्रतिमा, जिसमें प्राण फूँकने के लिए किसी और की आवश्यकता नहीं। यही उसका आत्मविश्वास है, यही उसकी सच्ची शक्ति।

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हर कदम, स्वच्छता की ओर

भारत को स्वच्छ बनाना हम सबकी जिम्मेदारी है। यदि हर व्यक्ति मिलकर कदम बढ़ाए और दिल से प्रयास करे तो कचरा चुनकर, गीले और सूखे कचरे को अलग रखकर हम अपने देश को स्वच्छ बना सकते हैं। शुद्ध हवा और निर्मल पानी हमारे जीवन के लिए अनिवार्य हैं, इसलिए प्रदूषण को रोकने और जल की प्रत्येक बूँद को बचाने का संकल्प लेना होगा। प्लास्टिक का उपयोग कम करना, कपड़े की थैली अपनाना और वृक्ष लगाना जैसे छोटे-छोटे कदम पर्यावरण को बचा सकते हैं। यदि हम सब मिलकर यह अभियान चलाएँ तो धरती को हरी-भरी दुल्हन की तरह सजा सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ और सुरक्षित भारत बना सकते हैं।

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Softly lit close-up of two Indian hands gently reaching toward each other without touching, expressing emotional connection, trust, and respectful intimacy in a calm, warm-toned setting.

स्पर्श : संवेदना का संगीत

कुछ स्पर्श शरीर को नहीं, मन को छूते हैं। वे न वासना जगाते हैं, न भय बस भीतर कहीं भरोसे की लौ जला देते हैं। मर्यादा में बंधे ऐसे स्पर्श रिश्तों को शब्दों से पहले समझा देते हैं और इंसान को इंसान होने का एहसास कराते हैं।

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मुश्किल है…

यह पाठ जीवन की कठिनाइयों और नैतिक संघर्षों का दर्पण है। यह बताता है कि सही और अच्छा बने रहना जितना सुनने में आसान लगता है, वास्तविकता में उतना ही कठिन है। चाहे परिवार और अपनों के साथ संबंध हों या समाज की अपेक्षाएँ, हमेशा सत्य और अच्छाई के मार्ग पर चलना चुनौतीपूर्ण होता है। लेखक अपने भीतर और बाहरी दुनिया में छिपे संघर्षों को उजागर करता है—अपने अंदर के रावण को पहचानना और उसे नियंत्रित करना, सही और गलत के बीच अंतर समझना, और स्वार्थी दुनिया में सच्चे और अच्छे लोगों की तलाश करना। यह न केवल व्यक्तिगत जुझारूपन का वर्णन है, बल्कि समाज और मनुष्य के अंतर्मन की जटिलताओं की भी गहरी झलक देता है।

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जिंदगी और कट चाय

पल-पल बीतते जा रहे हैं, और जीवन का रस धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। इसलिए बेकार की बातें छोड़कर मौजूदा समय का आनंद लेना चाहिए। मित्रों के साथ बिताए गए पल, उनकी हँसी, कभी-कभी उनके आँसुओं की चिंता, और साथ में पी गई चाय—ये सब छोटी-छोटी खुशियाँ जीवन को पूर्ण बनाती हैं। यह कविता समय की अनवरत गति, मित्रता, साधारण सुख और जीवन के क्षणों की क़ीमत का स्मरण कराती है।

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कितनी खूबसूरत ये तस्वीर है… ये कश्मीर है

म बचपन से पढ़ते आए हैं …धरती पर अगर स्वर्ग कहीं है तो यहीं है… यहीं है… यहीं है…. अमीर खुसरो ने कश्मीर को बहुत सुंदर तरीके से व्यक्त किया है. थोड़े बड़े हुए तो और एक गीत सुना… कितनी खूबसूरत यह तस्वीर है… हां यह कश्मीर है. कश्मीर का नाम सुनते ही एक खूबसूरत तस्वीर नजरों के सामने आ जाती है जो हमने अक्सर फोटोस या फिल्मों में देखी है. बर्फ से ढकी चोटियां, खूबसूरत कॉटेज और पानी पर बहते हुए शिकारे यह तमाम खासियत कश्मीर को धरती का स्वर्ग बनाती है.

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डॉ. राधा मंगेशकर पुणे पर्यटन महोत्सव उद्घाटन समारोह में भाषण देती हुई, आसपास उपस्थित पदाधिकारी और दर्शक

सोलो ट्रैवल और आत्मविश्वास

पुणे में आयोजित तीन दिवसीय छठे पुणे पर्यटन महोत्सव में प्रसिद्ध गायिका और सोलो ट्रैवलर डॉ. राधा मंगेशकर ने उद्घाटन किया. उन्होंने बताया कि यात्रा न केवल मन को आनंद देती है बल्कि आत्मविश्वास और सहनशीलता को भी बढ़ाती है. महोत्सव में महाराष्ट्र और भारत के ऐतिहासिक, धार्मिक और ऑफबीट पर्यटन स्थलों की झलक देखने को मिली. लगभग 70 टूरिस्ट कंपनियों के स्टॉल्स लगे, और युवाओं, परिवारों और यात्रा प्रेमियों को जानकारी दी गई. डॉ. मंगेशकर ने सोलो ट्रैवल के महत्व और व्यक्तिगत विकास में इसके योगदान पर जोर दिया. यह महोत्सव पुणेकरों के लिए निशुल्क खुला है और आने वाले सप्ताहांत तक जारी रहेगा, जिसमें कैलास मानसरोवर यात्रा, जंगल पर्यटन मार्गदर्शन और कॉर्पोरेट ट्रैवल सत्र भी होंगे.

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“कभी खुद के लिए भी जी ले माँ…”

जाने हमेशा ऐसा क्यों लगता है सारे असंभव काम आप ही कर सकती हो… जादुई सी बेतरतीब से बंधे माँ के जूडे से हमेशा बाल की एक पतली सी लट छूट जाया करती थी, जो पसीने से गर्दन में चिपकी रहती। इतनी गर्मी में रोटियां बनाते हुए माँ पसीने से नहा उठती। सब काम निपटा…

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गुज़र जाने के बाद…

तूफ़ान गुजरने के बाद बर्बादी की तस्वीर सामने थी। होश आया तो बस खालीपन और ग़म ही हाथ लगा। मेहंदी का नाम गीतों में मशहूर है, पर दुल्हन की हथेलियों पर उसका रंग तब ही सँवरता है जब वह अपने घर पहुँचती है। ज़िंदगी ने कई ज़ख्म दिए थे, मगर सबसे गहरा घाव तेरे मुकर जाने के बाद ही मिला। डर है कहीं जंगल भी इतिहास न बन जाएं और शजर खो देने पर हमें अपनी भूल पर पछताना न पड़े। अब कनक किससे अपना दिल का हाल कहे—प्यार का नशा तो आता है, पर उसका असर देर से समझ आता है, जब सब कुछ बीत चुका होता है।

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क्या करूँ

उस रात देर तक खिड़की के पास बैठी रही। सामने मेज़ पर रखा एक ख़त बार-बार उसकी नज़र खींचता, पर वह उसे खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। बाहर चाँदनी का उजाला कमरे में फैल गया था — उतना ही शांत और अकेला, जितना उसका मन। आईने में बार-बार खुद को निहारते हुए उसे महसूस हुआ कि वह सिर्फ़ अपने आप से बातें कर रही है। वह सोचती रही — जब मिलने नहीं आते, तो इस फ़ुर्सत का क्या करे? जब बिछड़ने का डर हर पल सताता है, तो इस दहशत का क्या करे? शायद यही मोहब्बत की लत है, जो छोड़ने से भी नहीं छूटती। और आखिर में, जब दोस्त कहते हैं “सब्र रख, गायत्री”, तो वह बस मुस्कुरा देती है — क्योंकि सब्र भी अब उसी की तरह थक चुका है।

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