कभी-कभी गलतफ़हमी

कभी-कभी हमें भ्रम हो जाता है कि सामने वाला सच में प्यार करता है उसकी बातों में अपनापन दिखता है, इकरार के लम्हे भी सच्चे लगते हैं। वह गले लगकर समझने का दावा तो करता है, पर दुनिया के सामने वही समझ कमज़ोर पड़ जाती है और हमारी नासमझी गिनाई जाती है। मन जैसा चाहे वैसा प्यार दे भी दे, और इल्ज़ामों की बरसात भी उसी मन से कर दे तब रिश्ते बोझ बनते देर नहीं लगती।

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खतरनाक मृगतृष्णा

पति की आंखों का अंधकार चित्रा के जीवन में भी इस तरह उतर आया था….. वह सब कुछ जानते समझते हुए भी……समझना नहीं चाह रही थी । कुछ दिनों के लिए ही सही पर एक जिंदगी जी ली उसने ।
लेकिन इस छलावे की जिंदगी ने उसे ताउम्र कारावास भुगतने के लिए मजबूर कर दिया ….

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पूर्णिमा की शांत रात में भारतीय शहर की एक संकरी गली, सामने खेतों के ऊपर उगता सुनहरी रोशनी से दमकता चाँद, धुंध में नहाया स्ट्रीट लाइट और हल्की एम्बर रोशनी में चमकते घर; माहौल में सादगी, स्मृति और अपनापन झलकता है।

पून्नो का चाँद

यह रचना पूर्णिमा की रात के एक दुर्लभ दृश्य को माँ की लोकबोली से जोड़ती है। चाँद सिर्फ आकाशीय पिंड नहीं रह जाता, बल्कि स्मृतियों, रिश्तों और भाषा के स्नेहिल स्पर्श में बदल जाता है—जहाँ “पूर्णिमा” माँ के लिए “पुन्नो” बन जाती है।

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कनॉट प्लेस में रंग-बिरंगे पंखे बेचती एक छोटी लड़की, मासूम आंखों और श्रम से भरी हथेलियों के साथ

वो लड़की

‘वो लड़की’ कविता एक मासूम बच्ची के संघर्ष, श्रम और सपनों को बेहद संवेदनशीलता से चित्रित करती है। उसकी छोटी-सी दुनिया में छिपी बड़ी संभावनाएं और भावनाएं पाठक को गहराई से छू जाती हैं, और समाज की सच्चाई को उजागर करती हैं।

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बदलता भारत

भारत आज तेजी से बदल रहा है। यह नवयुग की पहचान अपने भीतर समेटे, नवोन्मेष के पंख फैलाए हर सपना साकार करने की दिशा में बढ़ रहा है। गाँवों तक इंटरनेट पहुँच चुका है, खेतों में आधुनिक मशीनें उतर आई हैं। बच्चों की आँखों में अब नई दुनिया के सपने झिलमिलाते हैं और ज्ञान की धाराएँ पहले से कहीं अधिक सहजता से बह रही हैं।

जहाँ कभी चूल्हों के धुएँ से घर-आँगन भर जाया करते थे, वहाँ अब हर रसोई गैस की लौ से जगमगा रही है। किसान मौसम का हाल मोबाइल ऐप से जानते हैं और डिजिटल मंडी से अपने परिश्रम का उचित मूल्य पा रहे हैं।

शहरों में मेट्रो की गति-सी तेज़ सोच ने जन्म लिया है। स्टार्टअप्स एक नए उद्यमशील भारत की तस्वीर गढ़ रहे हैं। बेटियाँ अब चाँद तक पहुँच रही हैं और सीमा की रक्षा में भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं। उनमें अब डर या बंधन नहीं, बल्कि हर मंज़िल हासिल करने का जज्बा है।

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इंटरसिटी बस में यात्रा करती हुई युवा भारतीय महिला

बढ़ रहा महिला सोलो ट्रैवल, बस यात्राओं में बड़ा इजाफा

भारत में ट्रैवल का नया ट्रेंड तेजी से उभर रहा है, जहां जेन-ज़ी महिलाएं सोलो बस यात्राओं के जरिए स्वतंत्रता और नए अनुभवों की ओर कदम बढ़ा रही हैं. हाल ही की एक रिपोर्ट के अनुसार 2019 के बाद भारत में महिलाओं की इंटरसिटी बस यात्राओं में 136 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. खास बात यह है कि इस बदलाव में छोटे शहरों की युवतियां भी बड़ी भूमिका निभा रही हैं, जो पढ़ाई, काम और घूमने के लिए आत्मविश्वास के साथ यात्रा कर रही हैं

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“खुश और आत्मविश्वासी भारतीय युवा दोस्तों का समूह, आधुनिक जीवनशैली और आपसी सहयोग का प्रतीक”

नया कलेवर नया फ्लेवर

आज की युवा पीढ़ी को अक्सर लापरवाह समझ लिया जाता है, जबकि वे आत्मनिर्भर, संवेदनशील और सहयोगी होते हैं। यह लेख उनकी सोच, जीवनशैली और हमारे मार्गदर्शन की भूमिका को उजागर करता है।

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एक व्यक्ति ध्यान में बैठा हुआ, अंधकार से प्रकाश की ओर बदलता वातावरण, आत्मचिंतन का प्रतीक

मंथन

“मंथन” एक गहन और विचारोत्तेजक हिंदी कविता है, जो वर्तमान समाज की विसंगतियों और मानवता के गिरते मूल्यों पर गंभीर प्रश्न उठाती है। यह कविता केवल समस्याओं को उजागर नहीं करती, बल्कि आत्मचिंतन और सुधार की दिशा में एक सशक्त संदेश भी देती है।

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ओ पारिजात

रात गहरी हो रही है और हवा में पारिजात की सुगंध घुल रही है। मैं जागता हूँ और कविताएँ लिखता हूँ, पर शब्द अब इस खुशबू में मदहोश होने लगे हैं। मैं रंगों की सुंदरता नहीं चाहता .मुझे तो प्रेम का वही लाल रंग चाहिए जो आत्मा को महका दे। मैं चाहता हूँ कि मैं पारिजात के आँगन की उसी मिट्टी में बो दिया जाऊँ, और वहीं लगातार महकता रहूँ। इस सिंदूरी भोर में, एक स्पर्श भर से मेरी कविता फिर जीवित हो उठी है।

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जब आती थी रामलीला..

महिदपुर रोड पर आयोजित रामलीला में हनुमान जी की झांकी सबसे रोमांचकारी थी. केले और फलों से लदे पेड़ों को छलाँग लगाकर तोड़ते, अशोक वाटिका उजाड़ते, और कभी-कभी फल दर्शकों की ओर उछालते। दर्शक इसे श्रद्धा से हनुमान जी का प्रसाद मान लेते थे।

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