गुरु कृपा से पावन हुआ ज्ञान मंदिर
पुण्यसम्राट श्रीमद् विजय जयन्तसेन सूरीश्वरजी म.सा. के दीक्षा दिवस पर ज्ञान मंदिर में दिनभर गुरु भक्ति, प्रवचन, तप, जाप और महाआरती के आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए.

पुण्यसम्राट श्रीमद् विजय जयन्तसेन सूरीश्वरजी म.सा. के दीक्षा दिवस पर ज्ञान मंदिर में दिनभर गुरु भक्ति, प्रवचन, तप, जाप और महाआरती के आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए.
मुंबई में संपन्न हुई काव्य गोष्ठी में युवा कवि उमेश चव्हाण के मराठी काव्य संग्रह ‘अर्घ्य’ का विमोचन हुआ। कार्यक्रम में प्रमुख साहित्यकारों और कला-संस्कृति के गणमान्य व्यक्तियों ने पुस्तक की प्रशंसा की और कवियों ने अपनी रचनाओं की प्रस्तुति दी।
“कलई करा लो…” की पुकार के साथ शुरू होती थी बचपन की हलचल। पीतल के बर्तनों की चमक, भट्टी की आँच और राँगे की खुशबू के बीच छिपी थीं मासूम खुशियाँ। यह संस्मरण केवल कलई की प्रक्रिया का वर्णन नहीं, बल्कि उस दौर की सादगी, पारिवारिक आत्मीयता और छोटी-छोटी बातों में मिलने वाली अपार खुशी की झलक है। आज की चकाचौंध भरी दुनिया में वे दिन याद बनकर मन को भिगो जाते हैं।
जीवन एक-वचन नहीं है। यह दो पत्थरों के रगड़ से जन्मी आग की तरह है—जहाँ दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे को प्रकाशित करता है। यह टकराहट नहीं, रचना है। हम सबके अनुभव अलग हैं, फिर भी जुड़ाव की ज़रूरत अपरिहार्य है। पर आज, हम सिर्फ़ व्यूज में हैं, अंतर्बोध में नहीं। जो घटित हो रहा है, वह केवल घटना नहीं, संवेदना है—लेकिन हम ठहरते नहीं, स्क्रॉल करते जाते हैं।
“24 सितंबर 2023 की एक आध्यात्मिक संध्या में, महिदपुर के गंगावाड़ी में संकीर्तन के दौरान भगवान की प्रेरणा से गोवर्धन की दंडवत परिक्रमा का विचार जागा। बिना किसी योजना और साथी के, केवल श्रद्धा और ईश्वर के भरोसे पर यह यात्रा शुरू हुई। मथुरा, यमुना स्नान, मुखारविंद दर्शन और तपस्वियों की प्रेरणा से भरपूर यह अनुभव, तन को थका कर भी आत्मा को जाग्रत कर गया। गिरिराज महाराज की कृपा से यह यात्रा एक भक्ति, साहस और समर्पण की जीवंत कथा बन गई।”
“हँसती हुई स्त्रियां” एक ऐसी भावनात्मक कविता है, जो स्त्री की मुस्कान में छिपी शक्ति, प्रेम और जीवन की सुंदरता को उजागर करती है। यह रचना बताती है कि एक स्त्री की सहज हँसी कैसे पूरे वातावरण को खुशियों से भर देती है और दूसरों के जीवन में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
जिसे जीवन में तिजारत नहीं, इंसान बने रहना सिखाया गया। पिता की सुरक्षा-केंद्रित सोच, मेले की छोटी-सी नौकरी और पहला व्यापारिक असफल अनुभव सब मिलकर यह बताते हैं कि हर हार नुकसान नहीं होती, कुछ हारें मनुष्यता बचा लेती हैं।
बरसों बीत जाने पर भी किसी एक रिश्ते का कसैलापन आपके मन के किसी अंधेरे कोने में अपनी जगह बना कर समय/ असमय आपके मन को कड़वाहट से भर देता है।
तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी हर छोड़ी हुई चीज़—कपड़े, प्याली, तौलिया—मुझे तुम्हारी याद दिलाती है। तुम बिखेरते जाते हो और मैं उन्हें जतन से सहेजती जाती हूँ, क्योंकि इन्हीं में हमारा रिश्ता साँस लेता है।”