अकेला तन, भरा मन…

* गिरिराज की ममता में लिपटी परिक्रमा



24 सितंबर 2023, रविवार की शाम। महिदपुर के गंगावाड़ी में आयोजित धार्मिक संकीर्तन में वृंदावन से पधारे पंडितजी के साथ समूचे वातावरण में हरिनाम की गूंज थी। जैसे ही संकीर्तन की लहरें हृदय में उतर रही थीं, वैसे ही मेरे अंतर्मन में अचानक गिरिराज धरण की दंडवत परिक्रमा करने की तीव्र इच्छा जागी। यह कोई सामान्य विचार नहीं था — यह भीतर से आई हुई स्पष्ट प्रेरणा थी, मानो स्वयं ठाकुरजी ने आह्वान किया हो।

संकीर्तन समाप्त होने के बाद मैंने मित्र गोपाल से चलने का प्रस्ताव रखा। उसने कहा, “सुबह बताता हूं।” अगले दिन जब भोपाल स्थित मित्र को फोन लगाया, तो उसने कहा, “आपकी यात्रा शुभ हो।” यही वाक्य मेरे लिए भगवान की अनुमति के समान था।

अब यात्रा टालने का कोई कारण न था। मैंने तत्काल मित्र संजीव शर्मा उर्फ ‘काका’ से टिकट की व्यवस्था करने को कहा। वह हँसते हुए बोला, “आज तो रिजर्वेशन मुश्किल है।” मैंने दृढ़ता से कहा, “आज ही जाना है, वेटिंग भी चलेगी।” संजीव ने 25 सितंबर की रात 8:00 बजे की वेटिंग टिकट ला दी। शाम होते ही मित्रों और परिवार के शुभाशीषों को लेकर स्टेशन की ओर प्रस्थान किया।

स्टेशन पर मुझे छोड़ने के लिए जो स्नेहभरे चेहरे आए उनमें थे — मेरे परिवारजन, सरपंच ऋतु पाटीदार, सुनील और रश्मि परिहार, संजीव शर्मा, नीतू शर्मा आदि। सब कह रहे थे, “तू अकेला जा रहा है?” मैंने उत्तर दिया, “भगवान मेरे साथ हैं।”

ट्रेन में एक खाली पड़ी बर्थ पर बैठ गया। भोजन कर सो गया। ईश्वर की कृपा से वेटिंग टिकट होने पर भी कोई मुझे नहीं उठाता और पूरी यात्रा आराम से कटती है। उस रात मेरे स्वप्न में स्वयं गिरिराज प्रकट हुए।

सुबह 2:30 बजे उठकर ट्रेन में ही तैयार होकर 3:00 बजे के आसपास मथुरा स्टेशन उतरता हूं। ऑटो से यमुना मैया के घाट पहुंचता हूं। पावन यमुना में स्नान कर, 6:00 बजे की आरती में सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त होता है। इसके बाद द्वारिकाधीश मंदिर में दर्शन कर श्री गोवर्धन के लिए सिटी बस पकड़ता हूं।

गोवर्धन पहुंचते ही दानघाटी के पास एक भक्त को 108 सुपारियों से 108 बार दंडवत परिक्रमा करते देखता हूं। यह दृश्य मेरे भीतर दृढ़ विश्वास भर देता है कि मैं अकेला नहीं हूं — गिरिराज मेरे साथ हैं। जतिपुरा मुखारविंद पहुंचकर पंडित मुरारीजी से मिलकर राधा कृष्ण पैलेस के सार्वजनिक हॉल में ठहरने की व्यवस्था होती है।

पंडित जी पूछते हैं, “आप अकेले आए हैं?” जब मैं ‘हां’ कहता हूं, तो वे मुस्कराते हुए कहते हैं, “जैसी गिरिराज की इच्छा।” वे मुझे विधिवत दंडवत परिक्रमा का प्रारंभ करवाते हैं। 11:00 बजे मंदिर में दूध अर्पण कर परिक्रमा आरंभ होती है — सिर पर तेज धूप, धरती की तपिश, पर मन में हरिनाम और बृजरज से भरा रोमांच।

करीब डेढ़ किलोमीटर तक दंडवत कर रास्ते में कंदमूल विक्रेता से कुछ ग्रहण करता हूं और हनुमान मंदिर तक पहुंचकर यात्रा को विश्राम देता हूं। वापसी में पंडित जी के ठिकाने पर स्नान, भोजन और विश्राम करता हूं। शाम को फिर हनुमान मंदिर पहुंचकर 5:00 बजे दंडवत आरंभ करता हूं, जो रात 10:00 बजे तक चलती है।

इसके बाद स्नान, भोजन और पुनः विश्राम…
(जारी…)

दर्पण सोनी, महिदपुर रोड, प्रसिद्ध ट्रेवलर

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