कल, और आज़

कल और आज़—दोनों समय की धुरी पर खड़े हैं। जो पल बीत गया, वह केवल स्मृति है, खट्टे-मीठे अनुभवों और तीखे शब्दों से भरा हुआ। वह कल मेरा प्रारब्ध नहीं बन सका, इसलिए उसे थामे रहना व्यर्थ है। आज़, जो अभी मेरी साँसों में धड़क रहा है, वही सच्चा गीत है, वही वास्तविक उत्सव है। आज़ ही वह क्षण है जो मुझे आनंदित कर रहा है, जो मुझे जीने का कारण दे रहा है। इसलिए कल की ओर लौटकर पछताने से बेहतर है कि आज़ को पकड़कर जिया जाए।

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माँ का रसोईघर

माँ चूल्हे की आँच में तपकर जीवन को महकाती है। आटे की लोई में वह अपने सपनों को गूँथती और बेलती है। दिनभर की थकान उसके चेहरे से तब गायब हो जाती है जब थाली में पकवानों की खुशबू फैलती है और परिवार का हर सदस्य संतोष से भोजन करता है। बच्चों की चमकती आँखों में उसे अपनी सबसे बड़ी तृप्ति मिलती है।

उसके लिए खाना सिर्फ शरीर का ईंधन नहीं है, बल्कि घर का प्रेम है, जिससे परिवार जीवित और आनंदित रहता है। उसकी रसोई एक तपोवन है, जहाँ वह हर दिन निस्वार्थ भाव से यज्ञ करती है

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तेरी यादों का सैलाब

तेरी यादें जब भी उठती हैं तो सैलाब-सी बनकर मन को बहा ले जाती हैं। आँखों से आँसुओं के कतरे ढलते हैं, और हर कण में तेरा ही नूर झलकता है। तू अपनी जुल्फ़ों से बहारों को महकाती है, इंद्रधनुष-सी रंगीन चूनर लहराती है और चांदनी रातों को मधुशाला बना देती है। जितना तुझे भूलने की कोशिश करता हूँ, उतनी ही गहराई से तू याद आती है।

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उम्मीद की किरण

सब कुछ बदलता है, और जब समय रोगग्रस्त हो जाता है, तो समाज भी अपने अंदर रोग छुपाए रहता है। दिलों में प्यार की कमी और भेदभाव का विष फैलता है, शांति पर चोट पहुँचती है और अशांति का बोलबाला होता है। भूख और पीड़ा में घिरी मासूम बच्ची इसका प्रतीक है—सूखे स्तन और अमुक्त शरीर से उसकी प्यास कैसे बुझेगी? ना ऊपर कोई छत है, ना कोई आवरण। यह समय रोगग्रस्त है, हवा भी विचलित है, लेकिन फिर भी कहीं न कहीं उम्मीद की एक किरण जलती रहती है।

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देवदूत बन गए पंकज यादव

ट्रैफिक आरक्षक पंकज यादव ने अपने कर्तव्य के प्रति अदम्य साहस दिखाते हुए कालानी नगर से तेज़ रफ्तार ट्रक को बड़ा गणपति सिग्नल तक रोकने की कोशिश की। ट्रक के नीचे फँसी बाइक और उसमें सवार युवक की जान खतरे में थी, लेकिन यादव और राहगीरों की सूझबूझ ने बड़े हादसे को टाल दिया।

यादव कहते हैं, “मैंने किसी पुरस्कार के लिए नहीं किया, बस ड्यूटी निभाई। मेरा मन यही सोच रहा था कि ट्रक को कैसे भी रोकूं।’’इस घटना में उनकी हिम्मत और आसपास के लोगों की तत्परता ने कई जानें बचाईं और सच्चे साहस की कहानी पेश की।

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नारी

नारी केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि जीवन का उद्घोष है। नारी कई रूपों में विघटित है, गणना से परे, क्योंकि इसके रूप तो अगणित हैं। आज नारी अबला नहीं, बल्कि सबला बनकर अपने अधिकार और सम्मान के परचम लहरा रही है।

पुरुष प्रधान जगत में नारी अब पुरुष से कम नहीं है। नारी पृथ्वी की शक्ति है; बिना नारी के जगत शक्ति विहीन है। संपूर्ण सृष्टि में नारी के बिना सब कुछ ही अधूरा और स्तरहीन है। नारी केवल कामिनी नहीं, शस्त्र-शास्त्र की पर्याय है। नारी केवल जन्मदाता नहीं, बल्कि कभी-कभी मृत्यु भी बन जाती है।

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आ अब लौट चलें

अब लगता है कि चलो लौट चलते हैं, क्योंकि हर पल अब बहुत भारी हो गया है। चारों ओर एक गहरी चुप्पी छाई हुई है, और हँसी भी किसी आरी में बंध गई जैसी लगती है। हंसते-हंसते शब्द अब बोझिल लगते हैं और रिश्तों की परछाइयाँ धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही हैं। उजाला घटता जा रहा है और समय की कठिनाइयाँ हर ओर महसूस होती हैं।

हमने समय के पार जाने की कोशिश की, एक-दूसरे का हाथ थामकर, बस एक तिनके के समान छोटा सा साथ पाने की कोशिश थी। लेकिन न कोई मँझधार आई, न तूफ़ान, न डोंगी डूबी, न मौसम लड़खड़ाया—फिर भी शब्दों की तुरपाई टूट गई और अपनापन पत्थर की तरह भारी लगने लगा।

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ठहर न सका वो प्रेम

सुबह का नशा धीरे-धीरे चढ़ा तो था, लेकिन शाम तक उतर गया। यह प्रेम भी कुछ वैसा ही था—जिसे टिकना चाहिए था, पर ठहर न सका। अजीब बात यह रही कि उसे भी तलाश थी और मुझे भी, लेकिन जब वह सामने खड़ा था, तब भी पता नहीं क्यों वह न जाने कहाँ गुम हो गया।

इसके बाद न कोई तलब बची, न कोई बेक़रारी। सब कुछ जैसे अचानक खत्म हो गया और मेरे भीतर की बेचैनियों को किसी ने एक ही पल में कुतर डाला। मुझे याद है, शायद वह कोई फकीर ही रहा होगा, जिसकी उपस्थिति ने मेरे मन को इस कदर सँवार दिया कि सब कुछ बदल गया।

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ज़िंदगी गुनगुनाने लगी

अब ज़िंदगी मानो गुनगुनाने लगी है। हवा की धीमी-धीमी बयार की तरह इसमें मिठास घुलने लगी है। मीठे सपनों की छाँव में रात भी अलसाई-सी करवट लेती है। मन अजीबोगरीब खयाल बुनता रहता है और उजली चांदनी-सी उम्मीद सँजोए रहता है।

बातों और मुलाक़ातों का सिलसिला लगातार चलता है, फिर भी दिल के भीतर कहीं एक हल्की-सी खलिश बनी रहती है। बीते दिनों में चारों ओर दावानल था, घाव भी हरे-भरे थे। ऐसे कठिन समय में उसकी बातें मोगरे की महक जैसी सुकून देती थीं।

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, showing two old brothers reconciling after a small quarrel, sitting together near a mud house courtyard. In the background, women are cooking on a traditional clay chulha with firewood, and a neighbor is taking fire from their hearth. Nearby, an old man is pounding rice in a wooden mortar with a pestle, while children peek curiously over a mud wall.

कहाँ गए वो लोग…

माज का जीवन कभी केवल नियमों या क़ानूनों पर नहीं चलता था, बल्कि आत्मसंयम, पश्चाताप और आपसी मेल-मिलाप पर टिका होता था। जब भी मान-अपमान की बात आती, लोग अहंकार को त्यागकर झुक जाते और पश्चाताप के साथ रिश्तों को सँभाल लेते। उस समय भाइयों में लड़ाई-झगड़े होते भी थे, लेकिन माँ के स्नेह के आगे सब झुक जाते और तुरन्त ही एक-दूसरे से गले मिल लेते।

घर-परिवार में रूठना-मनाना आम बात थी। लोग थोड़ी देर नाराज़ होकर भी घर लौट आते और अपनों का साथ नहीं छोड़ते। गाँव में दीवारें बनीं, लेकिन दिलों की दूरी कभी स्थायी नहीं रही। चूल्हा जलता देख पड़ोसी से आग माँगने जाना अपनत्व का प्रतीक था। जीवन सरल था और सम्बन्ध घनिष्ठ।

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